Sunday 28 December 2008

आपको एक वाकया सुनाता हूं...


जो कहानियां सच्ची होती हैं, वे कहीं भी मिल जाती हैं। दिमाग के कोनों में या दिल की सिलवटों के नीचे तलाशने से भी इतनी अच्छी कहानी नहीं मिलती। तीन दिन पहाड़ों की तनहाई में खाक छानने के बाद बिना किसी कहानी के लौटते वक्त मैं यही सोच रहा था। एक तरफ पहाड़ था और दूसरी तरफ खाई। दोपहर के वक्त सड़क पर अकेली दौड़ती मेरी गाड़ी पहाड़ों की हरियाली पर दाग थी या सड़क के सूनेपन पर जिंदगी का निशान, इस ऊहापोह में मैं कोशिश कर रहा था कि पूरा ध्यान सामने ही रहे।

इस कोशिश का फायदा यह हुआ कि मुझे दूर से ही नज़र आ गया कि सड़क पर कुछ गिरा हुआ है। थोड़ा आगे बढ़ा तो लगा कि किसी का टेडी बेयर गिर गया है। देखने में छोटे-से पिल्ले जैसा नजर आ रहा वो टेडी बेयर इतना सजीव लग रहा था कि मुझे उसके बनाने वाले पर गुमान होने लगा। लेकिन इस गुमान को टूटते कुछ सेकंड्स भी नहीं लगे और उससे पहले तो मेरी रफ्तार टूट चुकी थी। चीं...............के साथ ब्रेक्स ने वील रिम के साथ और पहियों ने सड़क के साथ थोड़ा संघर्ष करने के बाद गाड़ी को ठीक वक्त पर रोक देने में मेरी भरपूर मदद की। सड़क के ठीक बीचोंबीच दिखाई दे रहा वह टेडी बेयर असली पिल्ला था। छोटा सा...मुश्किल से एक-डेढ़ महीने का। स्याह काले रंग के उसके बालों के बीच मुंह और पंजों के पास सफेद चकत्ते उसकी मासूमियत में शरारत की मिलावट कर रहे थे।

मैं गाड़ी से उतरकर आगे बढ़ा तो अलर्ट की मुद्रा में बैठा पिल्ला कुछ देर तक मुझे देखकर पहचानने की कोशिश करता रहा। मेरे तीन ही कदमों में उसे जाने क्या अपनापन नज़र आया कि वह दौड़कर खुद ही मेरे पास पहुंच गया और पैरों में लिपट गया। मैंने प्यार से उसे उठाया और जानवरों के लिए मेरा प्यार उमड़ पड़ा। मैंने उसे सहलाया-दुलराया और उस सुनसान इलाके में पहाड़ी के ऊपर बनी एक बिल्डिंग की तरफ देखकर सोचने लगा कि यह वहीं कहीं से आ गया होगा। मेरा मन हुआ कि उसे अपने साथ ले चलूं... लेकिन तभी दफ्तर की व्यस्तता और दिल्ली की भागदौड़ में बीत जाते अपने वक्त की गुंजाइश उसके प्यार के आगे बड़ी दिखाई देने लगी। मैं उसके लिए आसपास की कोई सेफ जगह तलाशने लगा। पहाड़ी के ऊपर बिल्डिंग की तरफ बढ़कर मैंने उसे रेलिंग के अंदर छोड़ दिया। मैं मुड़ा ही था कि वह फिर मेरे कदमों में लिपट गया और इससे पहले कि मैं झुककर उसे उठा पाता, अपनी पूरी ताकत से सड़क के दूसरी तरफ भागने लगा। हालांकि उस वक्त सड़क सुनसान थी, लेकिन कोलतार की उस चादर पर पर नन्ही-सी जान को भागते देख भविष्य की किसी अनहोनी ने मुझे थोड़ा अनकंफर्टेबल कर दिया। तब तक वह सड़क के दूसरी तरफ खाई के किनारे पहुंच चुका था। वहां से उसने मेरी ओर देखकर रोना शुरू कर दिया।

हैरत के साथ मैं उसके पास पहुंचा, तो मुझे महसूस हुआ कि दो पिल्ले रो रहे हैं। मैं हैरत से इधर-उधर दूसरे पिल्ले को तलाशने लगा। करीब दस कदम तक बढ़ने के बाद मुझे नीचे गहराई से आवाज आती सुनाई दी। ढूंढते-ढूंढते जब मैं सड़क किनारे झाड़ियों के बीच पहुंचा, तो छह-सात फीट गहरे गड्ढे से आती पिल्ले के रोने की आवाज का सोर्स मुझे मिल चुका था। मैं तुरंत उस गड्ढे में उतरा और ऊपर चढ़ने की कोशिश करते उस छोटे-से पिल्ले को अपनी बाहों में ले लिया। पिल्ला मेरे सीने से इस तरह चिपक गया, जैसे बंदर अपनी मां के पेट से चिपका हो। उसकी तेज धड़कनों को मैं महसूस कर पा रहा था। उसने रोना बंद कर दिया था। मैं बाहर निकला, तो देखा कि दूसरा पिल्ला भी गड्ढे के पास आ बैठा था। अब वह रिलैक्स्ड नजर आ रहा था। मैंने दोनों को हाथों में उठाकर सहलाया।

उस पिल्ले के सड़क पर उस तरह बैठने और मेरे पास आने की वजह मैं जान चुका था। तब तक उस बिल्डिंग की तरफ से कुछ बच्चे आते नज़र आए। मैं उन तक पहुंचा और उन्हें पिल्ले देते हुए कहा कि इन्हें गांव में ले जाना, सड़क पर खतरा है। पिल्लों को बच्चों के सुरक्षित हाथों में सौंप मैं कार की तरफ बढ़ने लगा तो उनमें से एक पिल्ला बच्चे के हाथ से छूटकर मेरे पास दौड़ता हुआ आया और कदमों में लिपट गया। उसके पंजों पर भूरे चकत्तों से मैं पहचानता था कि यही गड्ढे से निकला था। मैंने एक बार फिर उसे उठाया, प्यार किया और बच्चे को देकर गाड़ी की ओर बढ़ गया। एक सच्ची कहानी और खूबसूरत याद मुझे अपनी कार के साथ दौड़ती नजर आई।


शुक्रिया नवभारतटाइम्स.कॉम

Thursday 25 December 2008

आज एक साथी को मंदी ने लील लिया

सुना आपने

मंदी आ गई है...मैंने अब तक सुना ही था...देखा नहीं था...आसपास से मंदी के मारों की कराहें सुनाई दे रही थीं...लेकिन कुछ दिखाई नहीं दे रहा था...दर्द का नहीं पता था...आज पड़ा मंदी का चाबुक पीठ पर...कल दफ्तर पहुंचा...सब ठीक था...मस्त था...क्रिसमस की तैयारियां चल रही थीं...प्लास्टिक के फूलों से त्योहार की खुशियां महक रही थीं...काम जारी था...अचानक बॉस ने सबको अपने ऑफिस में बुला लिया...सब हैरत में थे...ऐसा होता नहीं है...खुसर-फुसर करते हम दफ्तर में चल पड़े...मॉर्निन्ग शिफ्ट के ही लोग थे...चार-पांच...सर गंभीर थे...मामला गंभीर था...अच्छी खबर नहीं...सर ने कहा...कुछ घबराहट हुई...सर आंखें नहीं मिला रहे थे...मैनेजमंट ने कहा है...दो लोगों को जाना होगा...बड़ी मुश्किल से ये दो नाम चुन पाया हूं...क्या करूं...इतना कहते-कहते सर फफक पड़े...सबसे मजबूत इंसान रो रहा था...सब चुपचाप दफ्तर से निकलकर अपनी-अपनी सीटों पर जा बैठे...कोई किसी से बात नहीं कर रहा था...कोई किसी से बात कर नहीं पा रहा था...कुछ देर में ‘वह’ आया...सबके साथ हंसा-मुस्कुराया...नया बच्चा है...खूब जोश है...दफ्तर आता है तो खुश होता है...मेरे पास आया...भैया कुछ नया सोचा है...आपकी शिफ्ट तो खत्म हो रही है...बाद में बताऊंगा...अपना लॉग इन दे दीजिए...काम करना है...अपनी सीट पर जा बैठा...काम में जुट गया...मेरे पेट में तितलियां कुड़मुड़ा रही थीं...कुछ देर में सर बाहर आए...उसे कहा जरा अंदर आओ...मेरी सांसें तेज हो गईं...आंखें भारी हो रही थीं...हाथ कांप रहे थे...अभी शिफ्ट खत्म होने में कुछ देर बाकी थी...वह अंदर चला गया था...कुछ देर में बाहर आएगा तो आंखों में आंखें डाल देगा...मैं डर गया...चुपके से उठा और निकल लिया...मेरे बस की बात नहीं थी...

कुछ देर बाद उसका फोन आया...भैया...इतना कहकर रोने लगा...फूट-फूटकर रो रहा था...मैं चाबुक का दर्द महसूस कर रहा था...

आज सुबह दफ्तर पहुंचा...दफ्तर सजा हुआ था...बेहतरीन सजावट थी...काफी खर्च किया गया था...बहुत खूबसूरत क्रिसमस ट्री था...लेकिन उसमें त्योहार की खुशियों की महक नहीं थी...मंदी की बू आ रही थी...

Sunday 14 December 2008

इस कसब को कत्ल कर दो...

सुना आपने

अफजल को फांसी की मांग फिर उठी। कल 13 दिसंबर था। संसद पर हमले की बरसी। तब तो मांग उठनी ही थी। जायज है। कुछ दिन बाद ऐसी ही मांग कसब के लिए भी होने लगेगी। यह मांग करने वालों के दूसरी तरफ वालों को भी अब तो पुरोहित और पांडे के नाम मिल गए हैं। दोनों तरफ वाले मांग रहे हैं कुछ न कुछ। लेकिन नफरत को फांसी देने की मांग कब उठेगी...

इस कसब को कत्ल कर दो...

छह दिसंबर पर कुछ लोग दुखी थे
कुछ लोग खुश थे
जो खुश थे
वे कुछ कर गुजरना चाहते थे
जो दुखी थे
वे मारकर मरना चाहते थे
वे जो खुश थे
26 नवंबर को दुखी दिखे
वे जो दुखी थे
26 नवंबर को खुश दिखे
मुझे पता ही नहीं
मैं किस खेमे बैठूं
मैं तो गोलगप्पे बेचता हूं
सड़क किनारे चौराहे पर
वे जो खुश थे,
कुछ कर गुजरने के लिए
यहीं से गुजरेंगे
वे जो दुखी थे,
मारकर मरने के लिए
यहीं से गुजरेंगे
मैं दोनों से डरता हूं
क्योंकि दोनों की दुश्मनी मेरे खोमचे से है

तुम ऐसा करो
इस कसब को कत्ल कर दो
चढ़ा दो फांसी अफजल को
तब शायद नफरत मिट जाए
जैसे उन्होंने मिटा दी
करकरे और काम्टे को मारकर
और
कुछ खोमचे उजाड़कर।

Friday 12 December 2008

चंद्रमोहन...सॉरी...चांद मोहम्मद जिंदाबाद...

सुना आपने
‘चंद्रमोहन जी’ चांद मोहम्मद हो गए...चंद्रमोहन जी ‘मोहब्बत की खातिर’ चांद मोहम्मद हो गए...’हरियाणा के चंद्रमोहन जी’ मोहब्बत की खातिर चांद मोहम्मद हो गए...बड़ी बात है...ना...किसी चंद्रमोहन का चांद मोहम्मद हो जाना बड़ी बात नहीं...मोहब्बत की खातिर बहुत से चंद्रमोहन चांद मोहम्मद हो जाने को तैयार बैठे हैं...उन्होंने अपनी डिप्टी सीएम की कुर्सी खोई...पलिटिकल करिअर को दांव पर लगाया...परिवार को खोया...फिर भी मुझे उनका चांद मोहम्मद हो जाना बड़ी बात नहीं लगता...लेकिन एक बड़ी बात है...हरियाणा के चंद्रमोहन...उस हरियाणा के चंद्रमोहन जहां मोहब्बत पाप है...मोहब्बत के जहान में जहां में खाप पंचायतों की हुकूमत चलती है...जहां किसी के इश्क की भनक भी लग जाए तो दरातियां, कुल्हाड़ियां और मां-बाप के जिगर ही खून के प्यासे हो जाते हैं...उस हरियाणा में किसी चंद्रमोहन का चांद मोहम्मद हो जाना बड़ी बात है...
मैं हरियाणा से हूं...मैंने वहां सैकड़ों लड़कियों को मोहब्बत की बलि चढ़ते देखा है...मैंने वहां इश्क के नाम पर गिरी लाशें देखी हैं...मैंने वहां परिवारों को हैवान बनते देखा है...मैंने वहं बाप को अपने ही बेटे की मौत पर पंचायत की मुहर लगाते देखा है...मैंने वहां मांओं को अपनी जवान बेटियों के गले घोंटते देखा है...मैंने देखा है कैसे एक हफ्ते के भीतर उन लड़कियों की शादी हो जाती है जिन्होंने मोहब्बत की पहली आवाज को अपने दिल में महसूस ही किया था...मैंने देखा है कि किसी मोहब्बत का पता चलते ही कैसे गांव के गांव इकट्ठे होकर मौत के फरमान सुना देते हैं...एक अंकल जी हैं...उनकी बेटी...मेरे साथ ही पढ़ती थी...पढ़ा लिखा परिवार था...अच्छे मां-बाप हैं...बेटी को प्यार दिया...फिर उसे प्यार हो गया...वही बेटी दुश्मन हो गई...शादी करके चली गई लड़के के साथ चुपचाप...घर कसाईखाना हो गया...वहां सिर्फ मरने-मारने की बातें होने लगीं...वही रिश्तेदार जो कल तक बेटी के सिर पर प्यार से हाथ रखते थे...उसके कत्ल की योजनाएं बना रहे थे...और इसे सही ठहरा रहे थे...
उस हरियाणा में चंद्रमोहन का चांद मोहम्मद हो जाना बड़ी बात है...चंद्रमोहन ने अपनी पहली पत्नी से दगा किया...अपने बच्चों के साथ अन्याय किया...ये सब बातें सही हो सकती हैं...इन पर अलग से बहस हो सकती है...लेकिन मोहब्बत के लिए जिस तरह की मिसाल पेश की गई है...इस तरह की और मिसालों की इस वक्त हरियाणा और पूरे देश को सख्त जरूरत है...और यह मिसाल एक राजनेता ने पेश की है... यह और बड़ी बात है...क्योंकि अगर ऑनर किलिंग है, तो इसकी बहुत बड़ी वजह राजनेता हैं...जो वोट की खातिर उन बेरहम पंचायतों के खूनी फरमानों पर खमोशी ओढ़ लेते हैं...
अगर चंद्रमोहन का चांद मोहम्मद हो जाना किसी एक और मोहब्बत को परवान चढ़ाने की वजह बन सका...तो चंद्रमोहन की कुर्बानी सफल है...उस जगह जहां बच्चे इश्क करने से डरने लगे हैं...अगर चांद मोहम्मद और फिजा को देखकर दो-चार नौजवान दिल एक-दूजे के लिए धड़क सके...तो चंद्रमोहन जिंदाबाद...उनकी मोहब्बत जिंदाबाद...

Tuesday 9 December 2008

मैं जनता से सख्त नाराज हूं...

सुना आपने

कांग्रेस जीती...बीजेपी जीती...बीएसपी भी जीत गई...छोटे-मोटे निर्दलीय भी कुछ न कुछ जीत गए॥और जनता यानी कि हम...उनके पीछे ढोल नगाड़े लेकर दौड़ पड़े...फलाना जी जिंदाबाद...फलानी जी अमर रहें...कोई अंडरडॉग बन गया...कोई हैट्रिक वाला नॉट आउट...और जनता यानी कि हम ताली पीट-पीटकर उनके साथ जश्न मनाने लगे...वही जनता यानी कि हम जो सिर्फ दो दिन पहले तक मुंबई हमले के नाम पर नेताओं को, राजनीति को गालियां बक रहे थे...सब कुछ बदल देने की बात कर रहे थे...देश का बेड़ा गर्क कर देने के लिए इन नेताओं को कोस रहे थे...अब इन्हीं नेताओं के ऊपर फूल फेंक रहे हैं...जय-जयकार कर रहे हैं...

देखा मैंने...अपने ऑफिस की खिड़की से...हजारों को जुलूस था...नेता कौन था मैं नहीं पहचान पाया...लेकिन जनता को मैंने पहचाना...ये वही लोग थे...जो कनॉट प्लेस में मारे गए थे....ये वही लोग थे...जिन्हें जयपुर में मंदिरों और बाजारों में खून से लथपथ पड़े देखा था...ये वही लोग थे...जो अहमदाबाद में सहमे से पुलिसवालों को दसियों बमों निष्क्रिय करते देख रहे थे...ये वही लोग थे...जिन्हें मुंबई के स्टेशन पर दो-तीन सिरफिरे लड़कों ने क्लाशनिकोव से भून दिया था...ये वही लोग थे...जो मेजर संदीप या करकरे के जनाजे में आंसू पोंछते नजर आए थे...और ये वही लोग थे.... जो गुस्से में भरे मुबई की सड़कों पर हजारों की तादाद में उतर आए थे॥सिलेब्रिटीज के पीछे-पीछे...हाथों में बैनर, तख्तियां और मोमबत्तियां लिए...

और देश को लगने लगा था कि जनता सच में कुछ बदल सकती है...नेता डरने लगे थे...उनके मुंह से उलटे-सीधे बयान निकलने लगे थे...खूब मेसिज आए...अब जागो...मेल्स आए...कुछ कर दिखाओ...मुंबई के आतंकवादी हमले का ही असर था कि बहुत दिनों के बाद पहली बार किसी गंभीर मुद्दे पर (वरना तो यह एकता गांगुली के टीम से निकाले जाने पर या फिर साइमंड्स के खिलाफ ही दिखती है) पूरा देश एक दिखा...क्या हिंदू क्या मुसलमान....यहूदी भी...एक ही सुर में बोल रहे थे...जब ये सब हो रहा था...तब मैं यही सोच रहा था कि ये जो गुस्सा है...कहां निकलेगा...ये जो उबाल है....कैसे उफनेगा...कुछ असर दिखा भी...पाटिल द्वय गए...देशमुख गए...एनएसए की भी नौकरी पर बन आई...लेकिन गुस्सा शांत नहीं हुआ था...

दोस्त कहते हैं मैं नेगटिव सोचता हूं...नीचे वाली दो पोस्ट पढ़कर सबने कहा कि मैं इस मुश्किल की घड़ी में मैं ओवर-क्रिटिकल हो रहा हूं...लेकिन जनता का गुस्सा देखकर मुझे भी लगने लगा था कि इस बार तो कुछ हो ही जाएगा...ये उबाल निकल ही जाएगा...लेकिन कहां...सरकार को भी नहीं सूझ रहा था शायद...तभी तो राइस मैडम आईं...उन्होंने समझाया या सरकार खुद समझी...पता नहीं...उबलते दूध में मारने के लिए फूंक मिल गई...अपना पाकिस्तान कब काम आएगा...बीस आतंकवादी लौटाओ...उस शख्स को इनाम मिलना चाहिए जिसने सालों पहले यह लिस्ट बनाई थी...लिस्ट निकली...पाकिस्तान के पास पहुंची...सारा गुस्सा पाकिस्तान पर शिफ्ट हो गया...

पाकिस्तान मुर्दाबाद...हमला करो...अमेरिका से कुछ सीखो...आतंकवादी ट्रेनिंग कैंपों को उड़ा दो...पाकिस्तान को सबक सिखा दो...अमेरिका ने भी मदद की...पाकिस्तान को कहा, देखो...इस गुस्से को निकालने में भारत की मदद करो...वह भी तो तुम्हारी मदद करता है...जब तुम्हारे यहां गुस्सा होता है...पाकिस्तान ने कार्रवाई शुरू कर दी...क्या बात है...फुस्ससससस...गुस्सा निकल गया...अब तो गेंद पाकिस्तान के पाले में है...होती रहेगी कार्रवाई...चलो हम जश्न मनाएं...जीत गया भई जीत गया...हमारा नेता जीत गया...

Tuesday 2 December 2008

फुंक चुकीं मोमबत्तियां

आप सुन ही रहे होंगे


कितना कुछ हो रहा है...आतंकवादियों ने जैसे देश में ऊर्जा भर दी हो...इतना कुछ होने से कुछ फर्क पड़ेगा क्या...मन में कुछ आया...


फुंक चुकीं मोमबत्तियां

हो चुके प्रदर्शन

आ गए इस्तीफे

मिल चुकीं सरकारें

बढ़ चुकीं दरारें

इंटरनैशनल सहानुभूतियां भी आ गईं

चलो अब उठो

जिंदगी चलाते हैं

रोटी कमाते हैं

जांच-वांच होती रहेगी

हम अगली बार के लिए

हिम्मत जुटाते हैं

Sunday 30 November 2008

जीत गए आतंक पर जंग...अब शर्म से डूब मरो

सुना आपने...

हम जंग जीत गए...आतंक पर हम बड़ी जंग जीत गए...

नरीमन हाउस को आतंकवादियों से खाली करवा लिया गया है॥यह घोषणा सुनते ही वहां मौजूद लोगों ने जय-जयकार शुरू कर दी। मुझे यकीन है टीवी के आगे बंधे बैठे पूरे मुल्क के बहुत सारे लोग उस जय-जयकार में शामिल थे। मैं नहीं था। चाहते हुए भी नहीं...बल्कि मुझे तो शर्म आ रही थी। मरीन हाउस के 'गौरवपूर्ण' दृश्यों को दिखाते टीवी एंकर बोल रहे थे – यह गर्व की बात है, हमारे बहादुर जवानों ने आतंक पर एक जंग जीत ली है, नरीमन हाउस पर कब्जा हो गया है। नीचे न्यूज फ्लैश चल रहा था – नरीमन हाउस में आतंकियों का सफाया...दो आतंकी मारे गए...पांच बंधकों के भी शव मिले...एक एनएसजी कमांडो शहीद।

किस बात पर गर्व करें? पांच मासूम जानें और एक बेशकीमती सैनिक खो देने के बाद दो आतंकवादियों के सफाए पर? 10-20-50 लोग मनचाहे हथियार और गोलाबारूद लेकर आपके देश में घुसते हैं। जहां चाहे बम फोड़ देते हैं। खुलेआम सड़कों पर फायरिंग करते हैं। आपकी बेहद आलीशान और सुरक्षित इमारतों पर कब्जा कर लेते हैं। आपकी पुलिस के सबसे बड़े ओहदों पर बैठे अफसरों को मार गिराते हैं। सैकड़ों लोगों को कत्ल कर देते हैं। आपके मेहमानों को बंधक बना लेते हैं। आपकी खेल प्रतियोगिताओं को बंद करवा देते हैं। आपके प्रधानमंत्री और बड़े-बड़े नेताओं की घिग्घी बांध देते हैं। तीन दिन तक आपके सबसे कुशल सैकड़ों सैनिकों के साथ चूहे-बिल्ली का खेल खेलते हैं और 'अपनी मर्जी से' मारे जाते हैं...इसे आप जीत कहेंगे? क्या यह गर्व करने लायक बात है?

आपको क्या लगता है, देश पर सबसे बड़ा आतंकी हमला करनेवाले आतंकवादियों को मारकर आतंक के खिलाफ यह जंग हमने जीत ली है? देशभक्ति अपनी जगह है, लेकिन सच यह है कि हम इस जंग में बुरी तरह हार गए हैं। उन लोगों ने जो चाहा किया, जिसे चाहा मारा, जिस हद तक खींच सके खींचा। आपको क्या लगता है, बंधकों को सेना ने बचाया है? जब वे होटलों में घुसे तो हजारों लोग उनके निशाने पर थे। वे चाहते तो सबको मार सकते थे। उनके पास इतना गोला-बारूद था कि ताज और ओबरॉय होटेलों का नाम-ओ-निशान तक नहीं बचता। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने इंतजार किया कि पूरी दुनिया का मीडिया उनके आगे घुटने टेक कर और जमीन पर लेटकर यह दिखाने को मजबूर हो जाए कि वे क्या कर सकते हैं। उनकी चलाई एक-एक गोली पर रिपोर्टर्स चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे थे – देखिए एक गोली और चली। इसे आप जीत कहेंगे?

यह देश पर सबसे बड़ा आतंकी हमला था...1993 के बम ब्लास्ट के बाद भी यही कहा गया था। जब वे हमारा जहाज कंधार उड़ा ले गए थे, तब भी यही कहा था। संसद पर हमला हुआ तब भी यह शब्द थे। अहमदाबाद को उड़ाया था, तब भी सब यही सोच रहे थे। दिल्ली, जयपुर, मुंबई लोकल...हर बार उनका हमला बड़ा होता गया...क्या लगता है अब इससे बड़ा हमला नहीं हो सकता? बड़े आराम से होगा और हम तब भी यही कह रहे होंगे।

क्या इसका इलाज अफजल की फांसी में है? क्या इसका इलाज पाकिस्तान पर हमले में है? क्या इसका इलाज पोटा में है? आतंकियों ने अपने ई-मेल में लिखा था कि वे महाराष्ट्र एटीएस के मुसलमानों पर जुल्म का बदला ले रहे हैं। वे गुजरात का बदला ले रहे हैं। वे आजमगढ़ का बदला ले रहे हैं। वे धर्म के नाम पर लड़ रहे हैं। भले ही उनकी गोलियों से मुसलमान भी मरे, लेकिन वे मुसलमानों के नाम पर लड़ रहे हैं। यूपी के किसी छोटे से शहर के कॉलेज में पढ़ने वाला अंसारी जब देखेगा कि आजमगढ़ से हुई किसी भी गिरफ्तारी को सही ठहरा देने वाले लोग कर्नल पुरोहित और दयानंद पांडे से चल रही पूछताछ पर ही सवाल उठा देते हैं, तो क्या वह धर्म के नाम पर हो रही इस लड़ाई से प्रभावित नहीं होगा? क्या गुजरात को गोधरा की 'प्रतिक्रिया' बताने वाले लोग मुंबई को गुजरात की प्रतिक्रिया मानने से इनकार कर पाएंगे?

जब वे लोग इस तरह के कत्ल-ए-आम पर उतर आए हैं तो क्या गलत है हिंदू प्रतिक्रिया भी। इसके जवाब में फिर मुस्लिम प्रतिक्रिया होगी। फिर हिंदू...फिर...

(नवभारतटाइम्स.कॉम से साभार)

Sunday 23 November 2008

क्या आपने सुनी है...रेप की सबसे भयानक खबर?

सुना आपने

फरीदाबाद में दो लड़कों ने अपनी मकान मालकिन को नशीली कोल्ड ड्रिंक पिलाकर बेहोश किया और फिर...फिर आप सब जानते हैं...आप सब समझते हैं। लेकिन यह खबर आपने नहीं सुनी होगी। कहां सुनेंगे ऐसी खबर! न वह मकान मालकिन कोई मॉडल थी...न कोई बड़ी हस्ती...उसका कोई रिश्तेदार भी बड़ा आदमी नहीं था...दोनों किराएदार ही किसी बड़े आदमी के रिश्तेदार होते तो...(किराएदार खुद तो बड़ा आदमी क्या होगा!)...फिर क्यों सुनी जाएगी यह खबर...पर खबर सुपर हिट थी...एक वेबसाइट पर हजारों लोग इसे पढ़ गए...

यानी जिसे खबर मिल गई उसने पढ़ मारी...क्यों...फर्क क्या पड़ता है...रेप की 8-10 खबरें रोज आती हैं...नाबालिग का रेप...दलित का रेप...पड़ोसी ने रेप किया...सिपाही ने रेप किया...रिश्तेदार ने रेप किया...बाप ने रेप किया...हम पढ़ते हैं...सब पढ़ते हैं...फर्क क्या पड़ता है...हर खबर तो पहले पन्ने पर नहीं आती...हर केस जेसिका नहीं हो जाता...हर विक्टिम प्रियदर्शिनी मट्टू नहीं हो जाती...इन 'छोटी-मोटी' विक्टिम्स के लिए कौन झगड़ता फिरेगा...जितनी तेजी से लड़कियां नहीं बढ़ रहीं, उतनी तेजी से ये 'छोटी-मोटी' विक्टिम बढ़ रही हैं...फिर भी खबरें छपती हैं...रोज़ छपती हैं...क्यों? सिनेमा की लोकप्रियता के बारे में कहीं पढ़ा था...लोग पर्दे पर वो देखते जो खुद नहीं कर पाते...इसलिए उन्हें अच्छा लगता है...खुशी मिलती है...फ्रस्ट्रेशन निकलती है...फिल्म हिट हो जाती है...रेप की खबरें भी तो कहीं...

उस दिन सुबह-सुबह ऑफिस पहुंचा ही था कि वाइफ का फोन आ गया...रोज आता है...अ वेन्ज्दे में नसीरुद्दीन ने बड़ा सही कहा था - वाइफ फोन करती है, पूछती है खाना खाया, चाय पी...असल में वह जानना चाहती है कि आप जिंदा हों या नहीं...मेरी वाइफ भी यही सब पूछती है...लेकिन उस दिन उसने नहीं पूछा...हलो, अपनी कॉलनी में रेप हो गया...क्या????? हां, कल रात...सड़क के किनारे खड़ी थी लड़की...किसी ने साइड में धकेल दिया और...कौन थी? पॉकेट ए में रहती है...लेकिन खबर तो कहीं नहीं है...अरे कौन चाहेगा कि उसकी बेटी की खबर छपे...उससे क्या होगा...बात सही थी...कौन चाहेगा...? लेकिन खबरें छपती हैं...हम पढ़ते हैं...सब पढते हैं...क्यों पढ़ते हैं...? मेरी कॉलनी में रेप...मेरे घर के पास रेप...तो सेफ कौन है...? कहीं...कभी...नहीं नहीं...यह मेरे लिए रेप की सबसे भयानक खबर थी...क्या आपने भी सुनी है कभी रेप की भयानक खबर??

Tuesday 11 November 2008

आज दो घटनाएं घटीं...

सुना आपने

टीवी पर सीरियलों के नए एपिसोड नहीं आ रहे हैं। दो दिन में तीन ऐसे लोगों से मुलाकात हुई जो इस बात से परेशान थे कि सीरीयलों के पुराने एपिसोड दिखाए जा रहे हैं।

आज दो घटनाएं घटीं...

एक
दुकान पर कुछ सामान खरीदने के लिए खड़ा था। मुझसे पहले एक महिला खरीददारी कर रही थी। मैं पीछे था।चेहरा नहीं देख पा रहा था। अपने सामान की बारी का इंतजार करती नजर ज़बर्दस्ती उसके सामान पर चली गई। हेल्दी फूड था। न्यूट्रालाइट बटर। शूगर फ्री। वीट फ्लेक्स। जूस। अब महिला को रस्क चाहिए थे। दुकानदार हेल्दी ब्रैंडेड रस्क ले आया। महिला ने कहा, कोई और भी है? दुकानदार ने एक- दो और अच्छे ब्रैंडेड पैकिट्स दिखा दिए। कुछ देर उलट-पलट के बाद महिला ने कहा अरे कुछ सस्ते वाला दे दो, कैसा भी...हमें कौन सा खुद खाना है, काम वाली बाई के लिए चाहिए...
महिला का चेहरा देखने का मन नहीं हुआ।

दो
रात को खाना खाने के बाद टहलने निकले। हल्की-हल्की ठंड हो गई है। पत्नी को कहा स्वेटर पहन लो। खुद भी एलन सोली की स्वेट शर्ट पहन ली। नौ बज रहे थे। इस वक्त लोग टहलते ही नजर आते हैं। किसी ने पीछे से आवाज लगाई दीदी बॉल ले लो। मुड़कर देखा, छोटा सा बच्चा था। छोटी सी साइकल थी। उस पर खिलौने लटक रहे थे। रंग-बिरंगे। प्लास्टिक की बड़ी-बड़ी बॉल्स थीं। गुब्बारे थे। बंदूके थीं। छोटी-छोटी कारें थीं। इस वक्त ये बच्चा कहां घूम रहा है...सांवला सा...बहुत ही प्यारे नैन-नक्श। सलीके से बनाए हुए बाल। एक ही रंग की पैंट शर्ट, जैसी सफारी सूट की होती है। कद भी छोटा सा। पापा कहां हैं, मैंने पूछा। नहीं हैं। उसकी जबान में कॉन्फिडंस था, बेचारगी नहीं। अच्छा लगा। उससे बात करने का मनने हुआ।

मां कहां है? घर पर है, जल गई है। जल गई है? हां, स्टोव फट गया था। और कौन है? छोटा भाई है। तुम कितने साल के हो? नौ साल का। स्कूल जाते हो? हां, दिन में। और शाम को गुब्बारे बेचते हो? हां। स्कूल का खर्चा कहां से आता है? वो अमरीश गौतम का बेटा है ना...जिसके लिए हम हाथ पर वोट देते हैं...वही देता है...मां की दवाई का खर्च भी। एक गेंद ले लो। कितने की है? बीस रुपये की। अच्छा दे दो। ये लो बीस रुपये। दस रुपये और ले लो। नहीं। क्यों? मां मना करती है।
छोटी सी साइकल लेकर छोटा सा बच्चा आगे बढ़ गया। मेरे हाथ में बड़ा सा दस का नोट झूल रहा था।

सुना आपने, टीवी पर सीरियल्स के नए एपिसोड नहीं आ रहे हैं। मैं सीरियल्स नहीं देखता। कोई बता सकता है इनमें क्या दिखाते है?

Friday 7 November 2008

जिए तू इस तरह...जिंदगी को तरसे

सुना आपने...

दिल्ली में एक और प्रेमी ने अपनी प्रेमिका पर तेज़ाब फेंक दिया...भई वाह...इसे कहते हैं तरक्की। मोहब्बत में भी हम तरक्की की राह पर हैं। एक पुराना गीत सुनकर मुझे अक्सर बड़ी हैरत होती थी। अब नहीं होती। धर्मेन्द्र एक पार्टी में जब इस गीत को गाते हैं तो सामने खड़ी आशा पारेख की आंखें भर आती हैं और वह पार्टी क्या घर ही छोड़कर चली जाती हैं। इस गीत को सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसे...मुझे गम देने वाले तू खुशी को तरसे... कोई कैसे अपनी प्रेमिका को ऐसी बद्दुआ दे सकता है...और उस गीत में धर्मेन्द्र के एक्सप्रेशंस...उफ्फ!!! उनके चेहरे पर उस वक्त कुत्ते मैं तेरा खून पी जाऊंगा वाले भाव कुछ-कुछ आने लगे थे। जिस नफरत से वह आशा पारेख को देखते हैं, उन्होंने शायर के भावों को एकदम सही शक्ल दी है...लेकिन इतनी नफरत !!! उस शख्स के लिए जिसे आप प्यार करते हैं !!! ये तेज़ाबी प्रेमी उस गीत के ही भाव लगते हैं...भाड़ में जाए त्याग, बलिदान...मैंने प्यार किया है तो हासिल भी मेरा है। और मेरा नहीं तो किसी का नहीं...जाने वो कैसे लोग थे जो याद में जिंदगी गुज़ार देने को तैयार रहते थे...मूर्ख थे। या उन्हें मोहब्बत में तेज़ाब का इस्तेमाल ही पता नहीं होगा...अब प्रेमी जान गए हैं। देखिए...इस तेज़ाबी प्यार में तड़प कम नहीं है। जज़्बात अधूरे नहीं है। हर हद से गुज़रने का वही हौसला है, बस दिशा अलग है। ये लोग कम से कम उन जैसे नहीं हैं जो तू नहीं और सही और नहीं और सही को प्यार मानते हैं...तेज़ाबी आशिक जलते तो हैं...उनके लिए इश्क कोई कबूतर नहीं जो रोज़ डाल बदल लेता है...लेकिन जलने वाले जलाने लगे हैं...अपने ही इश्क को...तो क्या तू नहीं और सही ही सही...पता नहीं...भला हो।

Sunday 2 November 2008

पुलिस की गोली से मरना क्या बड़ी बात है?

सुना आपने...
मुंबई में राहुल राज मारा गया...पुलिस के हाथों...हंगामा हो गया...सरकारें हिल गईं...नेता प्रधानमंत्री से मिलने पहुंच गए...राज्य सरकार के दफ्तरों में सेंटर के फोन घनघनाने लगे...राहुल के घर मीडिया का जमावड़ा लग गया...मंत्री, संतरी सब पहुंच गए....पिता ने कहा बेटा बेकसूर था...बहनें बिलखतीं दिखाई दीं तो सब भावुक हो गए....पुलिस की गोली से मरना क्या इतनी बड़ी बात है...ठीक एक दिन पहले पुलिस की गोली से कोई मरा था...एक कॉलम की खबर थी...किसी ने पढ़ी, किसी ने नहीं...उसके हाथ में बंदूक भी नहीं थी...वह किसी को मारने भी नहीं आया था...वह किसी से बदला भी नहीं चाहता था...सड़क पर विरोध प्रदर्शन किया...पुलिस की गोली चली...मारा गया...कोई नहीं हिला...कोई नहीं मिला...मां-बाप से किसी ने नहीं पूछा...बारामूला और मुंबई में दूरी बहुत है...इरफान और राहुल में फर्क बहुत है...पुलिस की गोली से मरना सबके लिए बड़ी बात नहीं...