Friday 25 September 2009

काजल की करारी टिप्पणी, क्षमा का समर्थन और मेरा जवाब

मैंने लिखा था – पुलिस अफसरों का महान सुझाव, हमें खराब हथियार दो। इस बहस को काजलजी और क्षमाजी को बहुत सलीके से आगे बढ़ाया है। उन्होंने काफी तर्कपूर्ण टिप्पणियां की हैं। लेकिन मैं उनका जवाब देना चाहूंगा...

काजल जी कहते हैं..

जब पुलिस को अत्याधुनिक साजो-सामान व सुविधाओं से लैस नही किया जाएगा तो पुलिस ऐसा ही सोचेगी।

कभी आपने सोचा है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्र में पोस्ट किए गए कॉन्स्टेबल की स्थिति क्या है, उसके पास क्या हथियार हैं, क्या व कब खाना मिलता है, उसके पास रहने की क्या व्यवस्था है, उसके पास यातायात की क्या सुविधा है, उसे किस मौसम के हिसाब से किस तरह की वर्दी मिलती है, उसके परिवार की क्या स्थिति है, उसके उच्चाधिकारी व इलाके के नेता उससे कैसा व्यवहार करते हैं, उसे कितना वेतन व कब मिलता है, उसके पास क्या संचार सुविधाएं हैं, उसे बिजली-पानी की भी सुविधा है? उसे शौच की मूलभूत सुविधाएं भी हैं क्या? कभी नेता लोगों के बारे में सोचा है कि क्या वे इस लायक हैं जो सभी कुछ हथियाए बैठे हैं?

बहुत आसान है हास्यास्पद बताना।

जिस पुलिस के आत्मविश्वास का स्तर इतना नीचा हो, जिसकी बात कोई नेता सुनने को राजी तक न हो,जिस पुलिस पर केवल निकम्मा कहा जाना ही बदा हो...उससे कोई अन्य आशा की भी नहीं जा सकती।

पर ताली एक हाथ से बजाने के बजाय अच्छा होगा कि पुलिस को इस सोच तक डिगाने के जिम्मेदार नेता लोगों को भी नंगा किया।


क्षमा जी कहती हैं...

Anti Naxalite Cell से संपर्क में हूं...इसके अनेक पहलु हैं ...police force कम है...जो बारूद /विस्फोटक बनाते हैं, उनपर पुलिस दल कैसे रोक लगा सकता है? यह काम गृह मंत्रालय के तहत आता है...और मंत्रालय में IAS के अधिकारी मंत्रियों के सचिव होते हैं...पुलिस इनके तहत रहती है...police इससे आगे क्या सुझाव देगी...ये बताएं ? गर reforms हों तो police कुछ अन्य तरीके अपना सकती है...reforms हो नहीं रहे...supreme court के order के बावजूद ( 1981 में ऑर्डर निकला था )...तबसे हर सरकार ने उसकी अवमानना की है ..अब आगे उपाय बताएं!

प्रकाश सिह, जो BSF (बॉर्डर सिक्यूरिटी फोर्स) के निवृत्त डीजीपी हैं, वो PiL दाखिल कर एक लम्बी कानूनी जिरह लड़ रहे हैं...सच तो यह है कि लोकतंत्र में जनता अपने अधिकारों का इस्तेमाल नहीं करती।

मेरा कहना है...

आपकी बात बिल्कुल सही है कि पुलिस को सुविधाएं नहीं मिलतीं। लेकिन क्या इस वजह से उसकी आलोचना बंद हो जानी चाहिए? क्या हम पुलिस की गलतियों को जाहिर करना सिर्फ इसलिए बंद कर दें कि वे ‘बेचारे’ तो ‘लाचार और मजबूर’ हैं? यह कुछ वैसा ही होगा कि पुलिसवालों को रिश्वत लेने का हक है क्योंकि उनकी सैलरी कम है। हम उनकी सैलरी बढ़ाने की बात कर सकते हैं, लेकिन किसी भी हालत में उनके रिश्वत लेने को तो जायज नहीं ठहराया जा सकता!

मैं आपकी इस बात से सहमत हूं कि पूरे सिस्टम में गड़बड़ियां हैं, लेकिन पुलिस उस सिस्टम का बेहद ताकतवर हिस्सा है। उसे असीम हक मिले हुए हैं और उसे सिर्फ इसलिए नहीं बख्शा जा सकता कि पूरा सिस्टम खराब है। ठीक है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्र में तैनात पुलिसवालों को सुविधाएं बहुत कम हैं, लेकिन क्या सिर्फ इसलिए उन्हें किसी भी मासूम को पकड़कर गोली मार देने और उसे नक्सली घोषित कर देने का अधिकार दे दिया जाना चाहिए? या सिर्फ इसलिए उनके मूर्खतापूर्ण सुझाव को सही ठहराया जाए?

पुलिस का रूखा और बेहूदा व्यवहार कितने अपराधी तैयार करता है, यह किससे छिपा है। कितने ही लोगों की शिकायतें सिर्फ इसलिए दर्ज नहीं की जातीं, क्योंकि थानों का रिकॉर्ड खराब हो जाएगा! रेप की शिकार गरीब औरतें शिकायत दर्ज करानेभर को ही दर-दर भटकती रहें और हम पुलिस की लाचारी का रोना रोते रहें? पैसे लेकर किसी को भी अपराधी बना देने का ‘गुणी शौर्य’, मासूमों को कत्ल करके उन्हें अपराधी घोषित कर देने की ‘बहादुरी’, किसी बड़े आदमी को गिरफ्तार करने से पहले फोन करके नेताओं से पूछ लेना कि कहीं उनका आदमी न हो...क्या जस्टिफिकेशन हो सकती है इसकी?

पुलिस के सिर पर निकम्मा कहा जाना बदा नहीं है, उसने खुद को निकम्मा साबित किया है। आप कहेंगे कि उन्हें तो नेता और आईएएस अफसर कुछ करने नहीं देते। नेता जिस तरह पुलिस का इस्तेमाल करते हैं, पुलिसवाले भी उनका कम इस्तेमाल नहीं करते। ‘बेहतर’ पोस्टिंग के लालच में जब यही लोग उनके आगे-पीछे नाक रगड़ते घूमेंगे तो वे क्यों नहीं इनका फायदा उठाएंगे! मैं फिर कहता हूं कि इसका मतलब नेताओं या अफसरों को जायज ठहराना नहीं है...कतई नहीं है...लेकिन सिर्फ इस आधार पर आप पुलिसवालों को माफी तो नहीं दे सकते।

Friday 18 September 2009

पुलिस अफसरों का महान सुझावः हमें खराब हथियार दो

दिल्ली में देश के सबसे बड़े पुलिस अफसरों का सम्मेलन हुआ। वे लोग देश की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए फिक्रमंद हैं। इसी की बेहतरी के लिए बातचीत हो रही है। इसी बातचीत में एक सुझाव आया है। देश के सबसे बड़े (और बहादुर?) पुलिस अफसरों की तरफ से आया यह महान सुझाव आप भी पढ़िए।

मैं www.navbharattimes.com की एक खबर को यहां कोट कर रहा हूं –

“चर्चा के दौरान नक्सलियों द्वारा भारतीय कंपनियों से लूटे गए विस्फोटकों का मुद्दा भी उठा। पुलिस अधिकारी चाहते हैं विस्फोटक बनाने वाली कंपनियां जो जिलेटिन छड़ें बना रही हैं उनको इस तरह बनाए कि वह एक निश्चित अवधि के बाद बेकार हो जाएं। निर्धारित अवधि के बाद इनका उपयोग ही न किया जा सके। नक्सली अभी जो विस्फोटक लूट कर रख लेते हैं उनका लंबे समय तक इस्तेमाल करते रहते हैं। इन कंपनियों द्वारा बनाए जाने वाले डेटोनेटर पर भी सवाल उठे।

अफसरों का कहना था कि डेटोनेटर ऐसे बनाए जाएं जिन्हें फटने में कुछ ज्यादा समय लगे। ऐसी स्थिति में सुरक्षा बलों के जवान और वाहनों का बड़ा बचाव होगा। क्योंकि अगर डेटोनेटर देर से फटेगा तो वाहन को बारूदी सुरंग या बम के ऊपर से निकलने का समय मिल जाएगा। उल्लेखनीय है कि नक्सली सुरक्षा बलों के खिलाफ सबसे ज्यादा बारूदी सुरंगों का ही इस्तेमाल करते है। सबसे ज्यादा नुकसान इन्हीं से होता है।”


पूरी खबर यहां पढ़ें

अगर यह खबर सही है (दोहराता हूं, अगर खबर सही है, क्योंकि यकीन नहीं हो रहा कि ऐसा सुझाव आया होगा पुलिस अफसरों की तरफ से) और मैं इस बात को सही समझ रहा हूं तो हमारे बहादुर पुलिस अफसर चाहते हैं कि हथियार खराब बनाए जाएं ताकि जब नक्सली उन्हें लूट कर ले जाएं, तो वे उनके काम न आ सकें।

इससे तो बड़े दिलचस्प निष्कर्ष निकलते हैं। पुलिस अफसर मान चुके हैं कि हथियार लूटे ही जाएंगे। वे लूट तो नहीं रोक सकते, इसलिए हथियार ही खराब कर दो। नक्सली सिर्फ लूटे गए हथियारों पर ही निर्भर हैं। उनके पास और कोई जरिया ही नहीं है।

युद्ध का एक तरीका होता है दुश्मनों की सप्लाई काट देना। लेकिन सप्लाई काटने का यह तरीका तो नायाब है।

निश्चिंत रहिए, आपकी सुरक्षा बहुत काबिल हाथों में है।

Friday 11 September 2009

डर जाओ, अब वह मरने के लिए तैयार है

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सुना तुमने,
इस बार उसने
मुंह चिढ़ाती भूख को
धमकाकर भगा दिया है।
हालात के पंछी
उसके घर के सामने वाले बरगद पर नहीं हैं
आज सुबह से।
कल रात से मजबूरियां भी
रोती सुनाई नहीं दीं।
बताते हैं,
कई रोज हुए
सूख चुका है
छलकती भावनाओं का कुआं।
और अभी-अभी बहाकर आ रहा है
आंसुओं की लाश,
बिना संस्कार किए।

डर जाओ,
अब वह मरने के लिए तैयार है।।

Friday 4 September 2009

जसवंत की किताब से रोक हटी, लेकिन विरोध जारी रहे

जसवंत सिंह किताब से गुजरात में पाबंदी हटा दी गई है। कोर्ट की दखलअंदाजी से ही यह संभव हुआ। नहीं तो फासीवादियों से तो यह उम्मीद नहीं की जा सकती थी। फिर भी, बधाई। उन सभी को, जो लोकशाही में भरोसा रखते हैं। आजादी में भरोसा रखते हैं। लेकिन फासीवाद का विरोध जारी रहे। जिन्ना के नाम पर हो रही खोखली राजनीति का विरोध जारी रहे। किताब के नाम पर हो रहे प्रोपेगैंडा का विरोध जारी रहे।