Monday 27 July 2009

कत्ल से पहले बहनें...बहनों के कत्ल के बाद

गांव से लौटा हूं...हरियाणा के गांव से...उसी हरियाणा के गांव से जहां लड़कियों का कत्ल जारी है...इज़्ज़त की बलिवेदी पर...

कत्ल से पहले
बहनें सुबह हैं
सुबह की चौखट पर फुदकती चिड़िया हैं
चिड़िया के परों पर ओस का कतरा हैं
कतरे के भीतर गीली रोशनी हैं
रोशनी का फैलता पागलपन हैं
पागलपन की तन्हाई हैं
तन्हाई में चुपके से जन्मती मोहब्बत हैं
मोहब्बत की दुनियावी घबराहट हैं
घबराहट का पहला कदम हैं
पहले कदम की मुखालफत हैं
मुखालफत का कत्ल हैं
कत्ल की रात हैं...

कत्ल के बाद
बहनें... वक्त हैं
वक्त के बोलते रिवाज़ हैं
रिवाज़ों की बढ़ती जरूरत हैं
जरूरतों की भटकती अहमियत हैं
अहमियत का सुर्ख अहम हैं
अहम की पिघलती इज़्ज़त हैं
इज़्ज़त की वेदी हैं
वेदी की ठंडी अग्नि हैं
अग्नि की पवित्रता हैं
पवित्रता की बासी फूल हैं
फूलों की सिसकती माला हैं
मालाओं के पीछे की चुप तस्वीर हैं


बहनों के कत्ल से पहले
भाई...मर्द हैं
बहनों के कत्ल के बाद
भाई... मर्द हैं।।

16 comments:

दिलीप मंडल said...

आपकी ये कविता तो रुला गई विवेक। यही सही समय है कविता करने का, जब बातों से बात न बने तो सही समय होता है कविता को संवेदना की भट्ठी में पकाने का।

बहुत ही दमदार कविता, संवेदना जगाती है, क्रोध भी और करुणा भी। करुणा सिर्फ बहनों के लिए नहीं, हरियाणा के तमाम भाइयों के प्रति भी। वो सचमुच दया के पात्र हैं। उनपर आंसू बहाइए विवेक।

बहरहाल हरियाणा को सभ्य बनने से अब ईश्वर भी नहीं रोक सकता। हमें हरियाणा में ब्रूनो की बेटियों की फौज खड़ी होने का इंतजार है।

रंजना said...

Kya kaha jaay...

M VERMA said...

भावो की पराकाष्ठा --- इतनी बारीकी
बहुत खूब

अनिल कान्त : said...

बहुत दमदार कविता....बेहतरीन

ओम आर्य said...

bahut hi sundar rachana ........par is rachana ki gaharai ko samajhane ki koshish kara raha hu

Anonymous said...

kavita likhna achha hai....agar is se nizam bhi bdl jayen.....to sch mein acha ho....

raj said...

aapne boht alag si kavita likhi jo dil ko chho gyee,rooh ko hila gyee,very touching....

vishnu-luvingheart said...

ek aisi tasveer jise sabhi dekhte hai par aankhen band karke...

pranava priyadarshee said...

shabd nahi hain tareef karne ko. hajaar - do hajaar shabdon kee report bhee shayad aise gahre bhaav na jagaa paati jaise bhaav aapki ya panktiyaan jagaa rahi hain. baharhaal, jab aap un gaavon tak pahunch gaye the to uski report (aupchaarik-anaupchaarik) hamara haque banti hai. ummeed hai kaheen aur nahee to is blog par hee sahee pr apki ek bhaavpoorn tathyaparak report ka bhee intejaar hai, jiskee kamee ye kavita poori nahi karti. beshak usse alag lekin behtareen kaam yah kavita kar gayee hai.
filhaal haardik dhanyavaad in panktiyon ke liye

रवि कुमार, रावतभाटा said...

बहुत ही उम्दा कविता...
कविता पर मंडल जी ने कह ही दिया जो शायद मैं भी कहना चाहता था...

अब यही कह सकता हूं कि ऐसा मन हो रहा है इस पर एक पोस्टर बना डालूं....

karuna said...

विवेकजी मानव की सही मनोवैज्ञानिक तस्वीर पेश की है ,बहुत अच्छी और सटीक रचना

shama said...

Uf ! Aapne to rula diya..

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बदायूनी said...

बहुत सुंदर विवेक जी,
भावो का इतना सुंदर सम्मिश्रण, कमाल है.....
बेहतरीन .......
एक और की प्रतीक्षा रहेगी

suraj said...

gagar mein sagar bhar diya. iappriciate you/ nanhe kavee; suraj kaithal

suraj said...

gagar mein sagar bhar diya. iappriciate you/ nanhe kavee; suraj kaithal

Harkirat Haqeer said...

विवेक जी आपकी रचना की जितनी तारीफ करूँ कम है ....सशक्त शब्दावली लिए बेहतरीन रचना .....!!