Tuesday 14 July 2009

गाय का गोश्त और हड्डियां मेरी चौखट पर फैला दीं

“नए घर में तीसरी या चौथी सुबह देखा कि चौखट के पास गाय का गोश्त और कुछ हड्डियां फैलाई गईं थीं। यह सिर्फ शरारत नहीं थी। मोहल्ले के कुछ उत्साही लड़कों द्वारा विरोध और गुस्से का प्रदर्शन था कि मैं मकान छोड़कर भाग जाऊं।”

गुलशेर खां शानी यानी एक ‘मुस्लिम हिंदी लेखक’। उनकी प्रतिनिधि कहानियों की भूमिका में लोठर लुत्से ने उनकी जिंदगी की एक घटना का ज़िक्र किया है। घटना बहुत महत्वपूर्ण है, समझने के लिहाज से भी और महसूस करने के लिए लिहाज से भी। दरअसल, यह घटना आईना भी है और तमाचा भी...


शानी अपने परिवार के साथ ग्वालियर गए। तब उनके साथी उनके वास्तविक नाम से परिचित नहीं थे। शानी ने कहा कि वह गैर मुस्लिम पड़ोस में रहने को तरजीह देंगे। साथी ने वजह पूछी तो शानी ने बताया कि मैं घोर धार्मिक वातावरण और कट्टरपंथी माहौल से दूर रहना चाहता हूं। साथी कुछ देर तक शानी को घूरते रहे और फिर उनके कान के पास आकर उन्हें पूरी तरह कॉन्फिडेंस में लेते हुए धीरे-से बोले – सुनिए, डरने की कोई बात नहीं। यहां साले मियां लोगों को इतना मारा है, इतना मारा है कि अब तो उनकी आंख उठाने की भी हिम्मत नहीं रही।

आखिरकार शानी ने एक खालिस मुस्लिम पड़ोस में मकान खोज लिया। नए घर में तीसरी या चौथी सुबह उन्होंने देखा कि उनकी चौखट के पास गाय का गोश्त और कुछ हड्डियां फैलाई गईं थीं।

‘यह सिर्फ शरारत नहीं थी। मोहल्ले के कुछ उत्साही लड़कों द्वारा विरोध और गुस्से का प्रदर्शन था कि मैं मकान छोड़कर भाग जाऊं।’ शानी को गलती से साहनी नाम का पंजाबी हिंदू समझ लिया गया था।

(शानी की प्रतिनिधि कहानियां से साभार)

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