Friday 13 February 2009

चड्डियों की बहस से अनजान


सुना आपने

वैलंटाइंस डे सजधज कर तैयार है। जंग भी अपने चरम पर है। आजादी के दीवानों की और कल्चर के ठेकेदारों की। मुझे यह बहस कभी समझ नहीं आई। जब भी मैंने इस बहस के बारे में सोचा, मुझे छत्तीसगढ़ के उस छोटे से गांव में मिली 'वह' और उसकी बेटी याद आ गई। उसके याद आते ही लगा, कितनी जरूरी है वैलंटाइंस डे मनाने की आजादी और आखिर किसके लिए है यह संस्कृति? उसकी कहानी और उसके सवाल कहां हैं ? जब तक उसके सवालों के जवाब नहीं दिए जाते, तब तक क्या इस तरह की बहस फिज़ूल नहीं है?

चड्डियों की बहस से अनजान
कॉन्डम की पहुंच से दूर
वह
आज किसी और फिक्र में है।
सर्दी तो जी ली गई
बदन बिछाकर
हाथ ओढ़कर,
खुद-खुद कर
थोड़ी-बहुत हरियाली उगलती
मरियल सी जमीन के सहारे,
पर गर्मी में
गांव की सूखी, तरसती जमीन से
कैसे मांगेगी आसरा?
इस बार फिर जाना होगा
मांसल पेड़ों के जंगल में
पत्थर चुगने के लिए,
जहां कोलतार के नीचे सुबकती जमीन का
अपना ही ठिकाना नहीं।
उससे पहले खरीदनी होगी
दो मीटर रंगीन इज़्ज़त,
क्योंकि उस जंगल में
इस बार बेटी भी होगी
रोटी देने वाले पेड़ों की निगाहों के सामने।
आओ, उसे बताएं
हम तुम्हारे लिए इंतजाम कर रहे हैं
संस्कृति में लिपटी इज़्ज़त का
और वैलंटाइंस डे मनाने की
आज़ादी का।
रोटी तो खैर,
तुम्हें उन घूरते पेड़ों से ही लेनी होगी।।

12 comments:

Anonymous said...

चड्ढियों की बहस से अनजान हो तो पता करो कि चड्ढी के नीचे क्या है?

अभिषेक आनंद said...

बहुत खूब लिखा है आपने विवेक. भारत का सच तो यही है. हाँ कुछ प्रगतिशीलता (नंगापन) के अनुमोदक जरुर चड्ढी और कंडोम की लडाई में लगे हुए है. काश कोई यहाँ की संस्कृति को समझ पाता.
हम भी करेंगे प्यार का इज़हार

Ratan Singh Shekhawat said...

बहुत सही लिखा है ! ये फालतू की लडाई है ! सस्ता प्रचार पाने के हथकंडे के आलावा और कुछ नही ! चाहे चड्डी वालें हों या राम सेना वाले ! सबका मकसद सिर्फ़ और सिर्फ़ प्रचार पाना ही लगता है !

परमजीत बाली said...

विवेक जी,बहुत ही उम्दा रचना है।बहुत बहुत बधाई।
आप की कविता एक कड़वा सच है।

सुजाता said...

विवेक आपकी चिंता सही है, लेकिन यह भारतीय समाज की विडम्बना है कि एक ही युग मे यहाँ हम कई युग एक साथ जी रहे हैं,हर स्तर पर एक अलग जंग छिड़ी है,यही किसी विकासशील देश की स्थिति हो सकती है।कानून,समाज,प्रशासन,व्यवस्था,तकनीक,फायनांस ....कितने ही मोर्चे खुले हैं और सब पर एक साथ लड़ना हमारीए नियति है।एक जंग के लिए दूसरी जंग पोस्ट्पोन करने की स्ट्रेटे
टेजी घातक साबित होगी क्योंकि वक़्त की चाल बहुत तेज़ है,जिसे जहाँ मंच और मौका मिले उसे वहीं से शुरुआत कर देनी चाहिए।

विवेक said...

मैं आपकी बात से सौ फीसदी सहमत हूं सुजाता जी। हर सवाल हल होना चाहिए। लेकिन कहीं तो यह तय हो कि सबसे जरूरी सवाल क्या हैं। जो लोग वैलंटाइंस डे मनाना चाहते हैं उन्हें उसकी पूरी आजादी होनी चाहिए। लेकिन हम-आप जैसे लड़ने वाले लोग जिस तरह अपनी पूरी एनर्जी इसी के लिए झोंक दे रहे हैं, ऐसा लग रहा है जैसे यही सबसे बड़ा सवाल है। पिछले पांच-सात साल में बाजारवादी ताकतों ने ऐसा माहौल बना दिया है कि वैलंटाइंस डे पर मिलने वाली आजादी ही सबसे जरूरी है। सारा फोकस इसी पर शिफ्ट हो गया है। उस वक्त में जब कामगारों को छटनी के नाम पर बेरोजगार किया जा रहा है, महिलाओं को काम के लालच में शोषित किया जा रहा है, बच्चों को शिक्षा इसलिए नहीं मिल रही, क्योंकि उनके मां-बाप गरीब हैं...उस दौर में हम वैलंटाइंस डे मनाने की आजादी के लिए बहस करें? जो लोग इसका विरोध करते हैं, बेशक वे नासमझ लोग हैं। लेकिन हम-आप, जो आजादी की अहमियत जानते हैं, हम तो समझें कि पहले आजादी की जरूरत किसे है।

रंजना [रंजू भाटिया] said...

विवेक जी आपकी बात और कविता ने एक सच कहा है ..जिसकी आज जरुरत है ..आपके लिखे से पूर्ण रूप से मैं सहमत हूँ ..जो मुद्दे पहले जरुरी है वह हल हो जो इन बेकार की होती बहस से पहले हैं जिनका .मकसद सिर्फ़ और सिर्फ़ प्रचार पाना है !

Arvind Mishra said...

सच है यह है वी डे का यथार्थ !

Suresh Chiplunkar said...

मैं कुछ नहीं कहूंगा अभी…

Dev said...

बहुत सुंदर रचना .
बधाई
इस ब्लॉग पर एक नजर डालें "दादी माँ की कहानियाँ "
http://dadimaakikahaniya.blogspot.com/

अमिताभ श्रीवास्तव said...

ek bahut bada varg in behaya chijo se door he...ye sab chochle he baazaar ke..aour un logo ke jinhe iske alava doosra koi kaam nahi he..
kher bahut sundar tarike se aapne apni baat kahi he..
kabhi samay nikaal kar mere blog par bhi aane ka kashta kare to aabhaari rahunga

मनुज मेहता said...

bahut khoob janab
akhiri panktiya to bahut hi sateek.
bahut kadva sach

regards
MAnuj MEhta