Saturday 24 January 2009

चलती बस में खड़ी लड़कियां

(सुना आपने...आज बालिका दिवस है...क्यों है?)

दिल्ली की चलती बस में खड़ी लड़कियां
बहुत इंटेलिजेंट होती हैं
वे अच्छी तरह समझती हैं
चेहरों की जबान,
आंखों के इशारों को ट्रांसलेट करना
उनके बाएं हाथ का खेल है,
माल, पटाखा और बम जैसे शब्दों के अर्थ
उन्हें अच्छी तरह मालूम हैं,
वे उन शब्दों के अर्थ भी जानती हैं
जो वे कभी नहीं बोलतीं।
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते जैसी बातों को
वे बकवास कहती हैं,
बस के अचानक ब्रेक लगने का दर्द
वे सीटों पर बैठे उन लोगों से भी बेहतर जानती हैं
जिनके सिर सामने की रॉड से टकराते हैं।

दिल्ली की चलती बस में खड़ी लड़कियां
मूर्ख नहीं होतीं
चुप होती हैं।
वे जानती हैं
बोलना कभी-कभी काफी महंगा पड़ जाता है,
वे जानती हैं कि इधर-उधर फिसलते हाथों में
तेजाब भी हो सकता है।
वे जानती हैं
3 रुपये की टिकट की असली कीमत,
वे जानती हैं
बस में सफर करते हर आदमी की औकात,
इसलिए
वे बस से उतरते ही खिलखिला देती हैं।

दिल्ली की चलती बस में खड़े
लड़के कैसे होते हैं?

13 comments:

राम त्यागी said...

well written

Udan Tashtari said...

क्या पता-हम तो दिल्ली में बस में चले ही नहीं.

महेंद्र मिश्रा said...

बढ़िया आलेख बधाई
गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामना

विष्णु बैरागी said...

भाई विवेकजी!
निस्‍सन्‍देह बहुत ही सुन्‍दर।
यह तो किसी भी मायने में 'थ्री डी कविता' के सिवाय और कुछ भी नहीं है। कविता पढते हुए मैं कविता में मौजूद लडकियों को देखता रहा।
आपकी कलम को सलाम।

अनिल कान्त : said...

सटीक और सुंदर लेख ....


अनिल कान्त
मेरा अपना जहान

विवेक सिंह said...

कमाल क्यों नहीं करोगे , आखिर हमनाम किसके हो :)

बढिया कविता ! बधाई !

vijay gaur/विजय गौड़ said...

इतनी अच्छी कविता के लिए क्या कहूं। सच बहुत सारा एक साथ कह रही है। "दिल्ली की चलती बस में खड़ी लड़कियां" सब कुछ जानती हैं। दिल्ली की चलती बस में खड़ी लड़कियों का चित्र ही अपने आपमें पूरी बात कह देता है। बधाई मित्र।

संगीता पुरी said...

बिल्‍कुल सही लिखा है....चुप रहने में ही भलाई है.....ऐसी स्थिति में बालिका दिवस मनाने का क्‍या फायदा.....सभी बालिकाओं को उनके बुहतर भविष्‍य के लिए बहुतबहुत शुभकामनाएं।

आदर्श राठौर said...

बढ़िया रचना

बदायूनी said...

a very good poem on a very good theme. Congratulation.

अनूप शुक्ल said...

शानदार कविता।

varsha said...

sirf dilli ki?? yah to kisi bhi bade shahar mein aam baat hai.. Bahut achchhi rachna..

विनीत कुमार said...

बहुत व्यावहारिक समझ के साथ कविता लिखी है आपने..अच्छा लगा।