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Thursday, 29 October 2009

क्यों रहें हम भारत के साथ!

श्रीनगर…शाम का वक्त...हसीन गुदगुदाती सी ठंड...डल लेक का किनारा...और मोहब्बत? सही सीक्वेंस तो यही बनता है...लेकिन ऐसा था नहीं...

श्रीनगर…शाम का वक्त...नवंबर की हसीन गुदगुदाती सी ठंड...डल लेक का किनारा...बंदूकें...और उन्हें थामे हरी वर्दी में घूमते फौजी...वे आपको लगातार घूरते रहते हैं...आंखें मिली नहीं कि वे आपके दिमाग में घुस जाते हैं...आपके ख्यालों को चीरफाड़ कर रख देते हैं...किसी साजिश की तलाश में...यानी आपके वजूद पर ही नहीं, ख्यालों पर भी संगीनों का पहरा...यूं संगीनों के पहरे में ख्यालों की चीरफाड़ के बीच मोहब्बत जैसे अल्फाज़ डरकर छिपे रहते हैं...

मुझे लगा यही तो हो रहा है कश्मीर के साथ...कश्मीरियत के साथ...वहां कैसे पनपेगी मोहब्बत...देश के लिए...भारत के लिए...उन संगीनों ने तो आपस में प्यार करने लायक भी नहीं छोड़ा है इंसानों को...श्रीनगर की खौफजदा सी गलियों में घूमते हुए टकराए वे नौजवान जाने क्यों अपने से नहीं लगते...उन आंखों में या तो बगावत दिखी या नफरत...मादा आंखों कुछ पनीला सा नजर आया था...ठीक-ठीक मालूम नहीं...मजबूरी थी शायद...इधर या उधर न हो पाने की मजबूरी...वे लोग हंसते हैं, खिलखिलाते हैं...लेकिन खुश नहीं हैं...गुस्सा हैं...कुछ भारत से, कुछ पाकिस्तान से और बाकी खुद से...

मैं जिक्र छेड़ने की कोशिश करता हूं, वे टाल देना चाहते हैं...एक गैर के सामने अपने घर की बातें करते शायद झिझक रहे हैं...मैं कुरेदता हूं, वे झिझकते हैं...मैं और कुरेदता हूं...वे फूट पड़ते हैं...क्यों रहें हम भारत के साथ...इसलिए कि हमारे बच्चों का बचपन भी फौजी बूटों की आहट से घबराते और गोलियों की आवाजों से सहमते हुए गुजरे...वे भी बड़े हों तो धमाकों की आवाज और कभी भी कुछ भी हो जाने का डर जिंदगी पर उनके यकीन की जड़ें हिला चुका हो...

लेकिन फौज तो आपके लिए ही है...आपकी सुरक्षा के लिए...मेरा भारतीय दिमाग तर्क करने से बाज नहीं आता...उनके पास जवाब है...हर बात का करारा जवाब...वो लड़की बोल उठती है...फौजें सरहदों पर अच्छी लगती हैं साहब, घरों की देहरियों पर नहीं...आपको कैसा लगेगा जब आप सुबह घर से बाहर निकलें तो आपका सामना दो अनजान लोगों से हो जो लगातार आपके घर के सामने तैनात रहते हैं...किसी और मजहब के...किसी और इलाके के...किसी और कल्चर को जीनेवाले...उनका मन करे तो अचानक रोककर आपके बदन को यूं खुरचने लगते हैं मानो बंदूके छिपाई हों, कपड़ों के भीतर नहीं, बदन के भीतर...कोई लड़की घर से बाहर निकले तो घूरती निगाहें उसका इस्तेकबाल करती हैं और दूर तक उसके पीछे लगी रहती हैं...अक्सर सुनते हैं फौजियों ने रेप किया...हम जानते हैं सब फौजी एक से नहीं होते...लेकिन डर तो एक होते हैं साहब...खबरों को शक में तब्दील होते देर नहीं लगती...किस पर यकीन करें, किस पर शक करें कुछ समझ में नहीं आता...

आप उन्हें गैर मजहबी, गैर इलाकाई, गैर तहजीब के मानते ही क्यों हैं...वे आपके अपने हैं, आपके अपने भारतीय...मैं ज्यादा भावुक तर्क करने की कोशिश में हूं...गलत कोशिश...वे धधक उठते हैं – आप मानते हैं?? आप मानते हैं सभी भारतीयों को सिर्फ भारतीय? हमने देखा है भारत के मुंबई में भारत के यूपी और भारत के बिहार वाले भारतीयों को मुंबई के भारतीयों के हाथों पिटते हुए, लुटते हुए...मरते हुए...वे तो गैर मजहब के भी नहीं थे...अलग तहजीब के भी नहीं थे...बस एक जगह से दूसरी जगह आए थे...क्यों नहीं माना गया उन्हें अपना...फिर हमसे आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि इन लोगों को अपना मान लें...वो भी तब, जब हमने देखा है, झेला है...इनकी मार को, इनकी घिन को...

मुझे शर्म आने लगती है, खुद पर...फिर संभलता हूं...एक सवाल है, मेरा रामबाण...कश्मीरी पंडित...उनके सामने उछाल देता हूं...वे क्या आपके अपने नहीं थे...उनका दर्द क्या कुछ नहीं...वे जो आज अपने घरों, अपनी जमीनों से कटे बैठे सिसक रहे हैं...क्या उन्होंने कम झेला है...वे मुस्कुरा देते हैं, मानो उन्हें इसी का इंतजार था...वो, जिसके बाल पुराने धोनी जैसे हैं, मुझे अपना मोबाइल पकड़ा देता है...उसकी स्क्रीन पर एक फोटो है...कहता है, ये क्वॉर्टर बनाए हैं सरकार ने उनके लिए जो चले गए हैं...सरकार चाहती है कि वे आ जाएं...क्वॉर्टर खाली पड़े हैं, वे नहीं आते...क्यों? सरकार उन्हें सुरक्षा देने को तैयार है, घर दे रही है...फिर भी वे नहीं आते...क्यों नहीं आते...आएं, जिएं वो सब जो हम जी रहे हैं...साझा करें हमारा दर्द...इस घाटी का दर्द...यह घाटी उनकी है तो इसका दर्द भी तो उनका है...आएं और लाल चौक पर धमाकों में लहू बहाएं, जैसे हम बहाते हैं...लेकिन नहीं, वे नहीं आएंगे...वे चले गए क्योंकि वे जा सकते थे...उनके पास जाने के लिए जगह थी...हम नहीं जा सकते, क्योंकि हमारे पास नहीं है वो जगह...हम कहां जाएं...दिल्ली? मुंबई? वहां भी हमें उन शक भरी निगाहों का सामना तो करना ही है...कश्मीरी पंडितों को कोई शक की निगाह से नहीं देखता...अपनाता है...हमें कोई नहीं अपनाता...शक की निगाह से देखता है...सबको लगता है कि फिरन के नीचे से अभी हम एके 47 निकाल लेंगे...

मेरे पास जवाब नहीं है...पर सवाल है...और वे जो उधर से आते हैं...वे आपके अपने हैं? नहीं साहब...बंदूक कहां किसी की अपनी होती है...हम जानते हैं कि वे भी अपने नहीं...ये घरों के बाहर खड़े रहते हैं तो उनको घरों के भीतर झेलना पड़ता है...दोनों ओर से मरना तो हमें ही है...इसीलिए तो कहते हैं कि हमें दोनों बख्श दो...हमें न ये चाहिए, न वे चाहिए...हम बस सुकून से रहना चाहते हैं...

60 साल में हम इन्हें अपना क्यों नहीं बना पाए...सेना भेजकर हमने क्या हासिल किया...नफरतें...इनका दिल जीतना हमारा फर्ज था...60 साल हो गए इस कोशिश में...और हम बुरी तरह नाकाम रहे हैं। आज भी वे लोग इस मुल्क को अपना नहीं मानते तो यह उनका नहीं हमारा कसूर है...आज भी हमें प्रशासन चलाने के लिए सेना की जरूरत पड़ती है...और जो लोग इस बात से खुश होते हैं कि चुनाव में भारी वोटिंग हुई, उनका जवाब भी मिला...’वह’ बोला – चुनाव में वोट हम भारत के लिए नहीं डालते, अपनी बिजली, सड़क और पानी के लिए डालते हैं, इनका कश्मीर के मसले से कोई लेना देना नहीं है...आपके मुल्क से इसका कोई लेना-देना नहीं.

आपका मुल्क...आपका मुल्क...चुभता रहता है...कौंधता रहता है...

Thursday, 1 October 2009

कल 'मुल्लों' को किसी ने देशद्रोही नहीं कहा

चैंपियंस ट्रोफी में कल गजब का दिन था...सब ‘मुल्ले’ पाकिस्तान की जीत के लिए दुआ कर रहे थे...और सब ‘ना-मुल्ले’ उस दुआ में शामिल थे...वही ‘ना-मुल्ले’, जो ‘मुल्लों’ को पाक की जीत के लिए दुआ करने का अपराधी घोषित करते हैं...और सजा भी तय करते हैं...देशद्रोह की...

कहते हैं पाकिस्तान को दी गई दुआ भी तो देश के लिए ही थी...कौन जाने वे ‘मुल्ले’ पाकिस्तान के लिए उसी तरह दुआ नहीं कर रहे थे, जैसे उन पर आरोप लगते हैं...लेकिन कल कोई सवाल नहीं था...कल उनका 'देशद्रोह' सबको जायज लग रहा था...कुछ 'नामुल्ले' कह रहे थे, अभी हो जाने दो बाद में देख लेंगे...उनकी बेबसी मजेदार थी...

दिलचस्प नजारा था...मजा आ गया...वक्त सबको आईना दिखा गया...

Friday, 8 May 2009

'हम'...जो औरतों को नंगा घुमाते हैं

फिर एक औरत को नंगा करके गांव में घुमाया गया। सजा के तौर पर। उसका अपराध ही इतना ‘घिनौना’ था कि इससे कम तो सजा क्या मिलती! लड़की को भागने में मदद की। पता नहीं लड़की को भगाया गया या वह ‘प्यार के चक्कर’ में खुद ही चली गई, लेकिन औरत ने किया है, तो ‘अपराध’ बड़ा है। और इतने बड़े अपराध की सजा भी तो बड़ी होगी!

वहां भीड़ जमा होगी। किसी ने पूछा होगा, क्या सज़ा दें? कहीं से आवाज आई होगी, इनके कपड़े फाड़ डालो। वाह...सबके मन की बात कह दी। हां..हां फाड़ डालो। एक ढोल भी मंगाओ। नंगी औरतों के पीछे-पीछे अपनी मर्दानगी का ढिंढोरा पीटने के काम आएगा। सज़ा भी दी जाएगी और सबको बता भी दिया जाएगा कि हम कितने बड़े मर्द हैं।

‘हम’... वही हैं, जो तालिबान को जी भरकर कोसते हैं। वे लड़कियों के स्कूल जलाते हैं, हम उन्हें नामर्द कहते हैं। वे कोड़े बरसाते हैं, हम उन्हें ज़ालिम कहते हैं। वे टीचर्स को भी पर्दों में रखते हैं, हम उन्हें जंगली कहते हैं। ‘हम’, जो हमारी संस्कृति और इज़्ज़त की रक्षा के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते हैं।

‘हम’... जो अपनी बेटियों के मुंह से प्यार नाम का शब्द बर्दाश्त नहीं कर सकते। यह सुनते ही उबल उठते हैं कि जाट की लड़की चमार के लड़के के साथ भाग गई। उन्हें ढूंढते हैं, पेड़ों से बांधते हैं और जला डालते हैं...ताकि संस्कृति बची रहे। इस काम में लड़की का परिवार पूरी मदद करता है, क्योंकि उसके लिए इज़्ज़त बेटी से बड़ी नहीं। उसके बाद लड़के के परिवार को गांव से निकाल देते हैं।

‘हम’… जो भन्ना उठते हैं, जब लड़कियों को छोटे-छोटे कपड़ों में पब और डिस्को जाते देखते हैं। फौरन एक सेना बनाते हैं...वीरों की सेना। सेना के वीर लड़कियों की जमकर पिटाई करते हैं और उनके कपड़े फाड़ डालते हैं। जिन्हें संस्कृति की परवाह नहीं, उनकी इज़्ज़त को तार-तार किया ही जाना चाहिए। उसके बाद हम ईश्वर की जय बोलकर सबको अपनी वीरता की कहानियां सुनाते हैं।

‘हम’...जो इस बात पर कभी हैरान नहीं होते कि आज भी देश में लड़के और लड़कियों के अलग-अलग स्कूल-कॉलेज हैं। जहां लड़के-लड़की साथ पढ़ते हैं, वहां भी दोनों अलग-अलग पंक्तियों में बैठते हैं। क्यों? संस्कृति का सवाल है। दोनों साथ रहेंगे तो जाने क्या कर बैठेंगे।

‘हम’...जो रेप के लिए लड़की को ही कुसूरवार ठहराते हैं क्योंकि उसने तंग और भड़काऊ कपड़े पहने हुए थे।

‘हम’...जो अपनी गर्लफ्रेंड्स का mms बनाने और उसे सबको दिखाने में गौरव का अनुभव करते हैं और हर mms का पूरा लुत्फ लेते हैं।

‘हम’...यह सब करने के बाद बड़ी शान से टीवी के सामने बैठकर तालिबान की हरकतों को ‘घिनौना न्याय’ बताकर कोसते हैं और अपनी संस्कृति को दुनिया में सबसे महान मानकर खुश होते हैं।

क्या ‘हम’ तालिबान से कम हैं?

कुछ कॉमेंट्स गैर-ब्लॉगरों के


खबर - दो औरतों को निर्वस्त्र घुमाया

(साभार - Navbharattimes.com)

Sunday, 30 November 2008

जीत गए आतंक पर जंग...अब शर्म से डूब मरो

सुना आपने...

हम जंग जीत गए...आतंक पर हम बड़ी जंग जीत गए...

नरीमन हाउस को आतंकवादियों से खाली करवा लिया गया है॥यह घोषणा सुनते ही वहां मौजूद लोगों ने जय-जयकार शुरू कर दी। मुझे यकीन है टीवी के आगे बंधे बैठे पूरे मुल्क के बहुत सारे लोग उस जय-जयकार में शामिल थे। मैं नहीं था। चाहते हुए भी नहीं...बल्कि मुझे तो शर्म आ रही थी। मरीन हाउस के 'गौरवपूर्ण' दृश्यों को दिखाते टीवी एंकर बोल रहे थे – यह गर्व की बात है, हमारे बहादुर जवानों ने आतंक पर एक जंग जीत ली है, नरीमन हाउस पर कब्जा हो गया है। नीचे न्यूज फ्लैश चल रहा था – नरीमन हाउस में आतंकियों का सफाया...दो आतंकी मारे गए...पांच बंधकों के भी शव मिले...एक एनएसजी कमांडो शहीद।

किस बात पर गर्व करें? पांच मासूम जानें और एक बेशकीमती सैनिक खो देने के बाद दो आतंकवादियों के सफाए पर? 10-20-50 लोग मनचाहे हथियार और गोलाबारूद लेकर आपके देश में घुसते हैं। जहां चाहे बम फोड़ देते हैं। खुलेआम सड़कों पर फायरिंग करते हैं। आपकी बेहद आलीशान और सुरक्षित इमारतों पर कब्जा कर लेते हैं। आपकी पुलिस के सबसे बड़े ओहदों पर बैठे अफसरों को मार गिराते हैं। सैकड़ों लोगों को कत्ल कर देते हैं। आपके मेहमानों को बंधक बना लेते हैं। आपकी खेल प्रतियोगिताओं को बंद करवा देते हैं। आपके प्रधानमंत्री और बड़े-बड़े नेताओं की घिग्घी बांध देते हैं। तीन दिन तक आपके सबसे कुशल सैकड़ों सैनिकों के साथ चूहे-बिल्ली का खेल खेलते हैं और 'अपनी मर्जी से' मारे जाते हैं...इसे आप जीत कहेंगे? क्या यह गर्व करने लायक बात है?

आपको क्या लगता है, देश पर सबसे बड़ा आतंकी हमला करनेवाले आतंकवादियों को मारकर आतंक के खिलाफ यह जंग हमने जीत ली है? देशभक्ति अपनी जगह है, लेकिन सच यह है कि हम इस जंग में बुरी तरह हार गए हैं। उन लोगों ने जो चाहा किया, जिसे चाहा मारा, जिस हद तक खींच सके खींचा। आपको क्या लगता है, बंधकों को सेना ने बचाया है? जब वे होटलों में घुसे तो हजारों लोग उनके निशाने पर थे। वे चाहते तो सबको मार सकते थे। उनके पास इतना गोला-बारूद था कि ताज और ओबरॉय होटेलों का नाम-ओ-निशान तक नहीं बचता। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने इंतजार किया कि पूरी दुनिया का मीडिया उनके आगे घुटने टेक कर और जमीन पर लेटकर यह दिखाने को मजबूर हो जाए कि वे क्या कर सकते हैं। उनकी चलाई एक-एक गोली पर रिपोर्टर्स चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे थे – देखिए एक गोली और चली। इसे आप जीत कहेंगे?

यह देश पर सबसे बड़ा आतंकी हमला था...1993 के बम ब्लास्ट के बाद भी यही कहा गया था। जब वे हमारा जहाज कंधार उड़ा ले गए थे, तब भी यही कहा था। संसद पर हमला हुआ तब भी यह शब्द थे। अहमदाबाद को उड़ाया था, तब भी सब यही सोच रहे थे। दिल्ली, जयपुर, मुंबई लोकल...हर बार उनका हमला बड़ा होता गया...क्या लगता है अब इससे बड़ा हमला नहीं हो सकता? बड़े आराम से होगा और हम तब भी यही कह रहे होंगे।

क्या इसका इलाज अफजल की फांसी में है? क्या इसका इलाज पाकिस्तान पर हमले में है? क्या इसका इलाज पोटा में है? आतंकियों ने अपने ई-मेल में लिखा था कि वे महाराष्ट्र एटीएस के मुसलमानों पर जुल्म का बदला ले रहे हैं। वे गुजरात का बदला ले रहे हैं। वे आजमगढ़ का बदला ले रहे हैं। वे धर्म के नाम पर लड़ रहे हैं। भले ही उनकी गोलियों से मुसलमान भी मरे, लेकिन वे मुसलमानों के नाम पर लड़ रहे हैं। यूपी के किसी छोटे से शहर के कॉलेज में पढ़ने वाला अंसारी जब देखेगा कि आजमगढ़ से हुई किसी भी गिरफ्तारी को सही ठहरा देने वाले लोग कर्नल पुरोहित और दयानंद पांडे से चल रही पूछताछ पर ही सवाल उठा देते हैं, तो क्या वह धर्म के नाम पर हो रही इस लड़ाई से प्रभावित नहीं होगा? क्या गुजरात को गोधरा की 'प्रतिक्रिया' बताने वाले लोग मुंबई को गुजरात की प्रतिक्रिया मानने से इनकार कर पाएंगे?

जब वे लोग इस तरह के कत्ल-ए-आम पर उतर आए हैं तो क्या गलत है हिंदू प्रतिक्रिया भी। इसके जवाब में फिर मुस्लिम प्रतिक्रिया होगी। फिर हिंदू...फिर...

(नवभारतटाइम्स.कॉम से साभार)