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Friday, 2 October 2009

तुमने राम को अपनाकर सही नहीं किया गांधी

हे गांधी बाबा

मैं तुम्हें बहुत मानता हूं। फिर भी, जब मायावती ने तुम्हें नाटकबाज़ कहा, तो मुझे ज्यादा दुख नहीं हुआ। हो सकता है नाटकबाज एक कड़वा शब्द हो, लेकिन यह कड़वाहट इसके अर्थ की गंभीरता को कम नहीं कर सकती।

ऐसा नहीं कि तुमने जो कुछ भी किया, वह एक नाटक था, कि तुम जो कहते थे उसे करना ही नहीं चाहते थे, लेकिन उसके नतीजे सिफर ही होने थे...सिफर ही हुए। क्या तुम्हारा एक भी मकसद पूरा हुआ? तुम जिस ‘राम-राज्य’ का सपना देखते-देखते विदा हुए, क्या एक पल के लिए भी यह राज्य उस ओर बढ़ पाया?

जवाब है नहीं...और अगर इसके लिए तुम्हें जिम्मेदार ठहराया जाए, तो गलत भी क्या है। भारत के इतिहास में एक तुम्हीं हुए, जिसकी एक आवाज पर पूरा देश कुछ भी कर गुजरने को तैयार था। लेकिन तुमने उन लोगों को राम के हाथों सौंप दिया। तुम जो भी करते, उसका श्रेय राम को दे देते...उस राम को, जिसके नाम पर हजारों साल से इस देश में हर 'गलत' काम को जायज ठहराया जाता रहा। राम से प्रेरणा पाते हिंदू धर्म के जिस आधार में खामियों की वजह से एक भेदभावपूर्ण, अन्यायी रस्म-ओ-रिवाजों और भौंडी परंपराओं से भरा समाज तैयार हुआ था, उसी राम की प्रेरणा और हिंदू धर्म के आधार पर तुम कैसे स्वस्थ और समतामूलक समाज तैयार कर सकते थे?

और यह बात तो राहुल सांकृत्यायन जैसे लोगों ने उसी वक्त तुम्हें समझा दी थी। मुझे नहीं पता, तुम जैसे महान दार्शनिक ने इसे कैसे समझा होगा, लेकिन तुमने जो किया, उसके नतीजे देखकर मुझे यह कहने का हक है कि तुमने जो आधार चुना, उसी में खामियां थीं। हजारों साल से पीड़ित ‘नीची जातियों’ को तुमने हरिजन कहकर ऊंचा उठाने की कोशिश की, लेकिन उसी हरि के नाम पर तो उन्हें ‘नीचा’ माना गया था। वे लोग जो खुद को गर्व से हिंदू कहते हुए और राम को मानते हुए भी इन ‘नीची जातियों’ को और नीचे धकेलते आ रहे थे, उन्हें तुमने न हिंदू धर्म को मानने से रोका, न राम को मानने से। उनके भेदभावपूर्ण विश्वास के आधार में ही कोई बदलाव नहीं हुआ, फिर सिर्फ नाम बदल देने से उस विश्वास के आधार पर तैयार मान्यताएं कैसे बदल सकती थीं?

हे गांधी बाबा, तुमने आत्मबल को नहीं, रामबल को ही मजबूत किया।

मैं इस बात से इनकार नहीं करता कि तुम्हें समाज की नब्ज का साफ-साफ पता था। तुमने उस नब्ज को पकड़ा भी सही। इस आधार पर तुमने लोगों को एक रास्ते पर चलने के लिए तैयार भी कर लिया। लेकिन मंजिल का पता तुमने नहीं बदला। उस मंजिल की ओर तो वे पहले ही बढ़ रहे थे, बस उनके रास्ते अलग-अलग थे। तुम्हारे अंदर इतनी समझ और ताकत थी कि उन्हें एक रास्ते पर जमा कर सको, तो तुम्हें उन्हें सही मंजिल की ओर भी मोड़ देना चाहिए था। इतिहास में पहली और शायद आखिरी बार ऐसा हुआ था कि हजारों साल से अलग-अलग रास्तों पर चलता पूरा देश एक जगह आ खड़ा हुआ था, एक साथ चलने को तैयार था और उनका नेतृत्व तुम्हारे हाथ में था। तुम चाहते तो उन्हें कहीं भी ले जा सकते थे। तुम चाहते तो उन्हें इन्सानियत के आधार पर आगे बढ़ने को कहते, राम के आधार पर नहीं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। तुमने तो उन्हें लड़ने से भी रोका तो राम की दुहाई देकर। उसी राम की दुहाई, जिसके नाम पर वे आमने-सामने आ खड़े हुए थे। कुछ इसलिए, क्योंकि वे राम को मानते थे और कुछ इसलिए कि वे राम को नहीं मानते थे। तुमने क्यों उन्हें नहीं समझाया कि राम से भी बड़ा है इन्सान? तुमने क्यों उन्हें नहीं बताया कि इन्सानियत सबका साझा आधार है और यही एक मात्र आधार हैं जहां कोई किसी से जुदा नहीं है?

तुम तो मरते-मरते भी उन्हें राम के हवाले कर गए। आखिरी वक्त में क्यों तुमने नहीं कहा कि हम सब इन्सान बनकर इस दुनिया, इस देश को संभालें।

देखो, तुम्हारे राम ने क्या कर डाला है। अब सब बंट चुके हैं। इस देश में हिंदू रहते हैं, मुसलमान बसते हैं, दलित हैं, व्यापारी हैं, कर्मचारी हैं, सरकारी हैं, प्राइवेट हैं...नहीं हैं तो बस इन्सान। तुम्हारे मुंह से निकला राम सबने लपक लिया है। सबका अपना-अपना राम है। सब अपने-अपने राम के लिए लड़ते हैं। कोई उस ‘राम’ को मंदिर में बिठाना चाहता है, कोई उस ‘राम’ को पावर बनाना चाहता है। अब तुम खुद भी तो ‘राम’ ही बन गए हो।

Sunday, 30 November 2008

जीत गए आतंक पर जंग...अब शर्म से डूब मरो

सुना आपने...

हम जंग जीत गए...आतंक पर हम बड़ी जंग जीत गए...

नरीमन हाउस को आतंकवादियों से खाली करवा लिया गया है॥यह घोषणा सुनते ही वहां मौजूद लोगों ने जय-जयकार शुरू कर दी। मुझे यकीन है टीवी के आगे बंधे बैठे पूरे मुल्क के बहुत सारे लोग उस जय-जयकार में शामिल थे। मैं नहीं था। चाहते हुए भी नहीं...बल्कि मुझे तो शर्म आ रही थी। मरीन हाउस के 'गौरवपूर्ण' दृश्यों को दिखाते टीवी एंकर बोल रहे थे – यह गर्व की बात है, हमारे बहादुर जवानों ने आतंक पर एक जंग जीत ली है, नरीमन हाउस पर कब्जा हो गया है। नीचे न्यूज फ्लैश चल रहा था – नरीमन हाउस में आतंकियों का सफाया...दो आतंकी मारे गए...पांच बंधकों के भी शव मिले...एक एनएसजी कमांडो शहीद।

किस बात पर गर्व करें? पांच मासूम जानें और एक बेशकीमती सैनिक खो देने के बाद दो आतंकवादियों के सफाए पर? 10-20-50 लोग मनचाहे हथियार और गोलाबारूद लेकर आपके देश में घुसते हैं। जहां चाहे बम फोड़ देते हैं। खुलेआम सड़कों पर फायरिंग करते हैं। आपकी बेहद आलीशान और सुरक्षित इमारतों पर कब्जा कर लेते हैं। आपकी पुलिस के सबसे बड़े ओहदों पर बैठे अफसरों को मार गिराते हैं। सैकड़ों लोगों को कत्ल कर देते हैं। आपके मेहमानों को बंधक बना लेते हैं। आपकी खेल प्रतियोगिताओं को बंद करवा देते हैं। आपके प्रधानमंत्री और बड़े-बड़े नेताओं की घिग्घी बांध देते हैं। तीन दिन तक आपके सबसे कुशल सैकड़ों सैनिकों के साथ चूहे-बिल्ली का खेल खेलते हैं और 'अपनी मर्जी से' मारे जाते हैं...इसे आप जीत कहेंगे? क्या यह गर्व करने लायक बात है?

आपको क्या लगता है, देश पर सबसे बड़ा आतंकी हमला करनेवाले आतंकवादियों को मारकर आतंक के खिलाफ यह जंग हमने जीत ली है? देशभक्ति अपनी जगह है, लेकिन सच यह है कि हम इस जंग में बुरी तरह हार गए हैं। उन लोगों ने जो चाहा किया, जिसे चाहा मारा, जिस हद तक खींच सके खींचा। आपको क्या लगता है, बंधकों को सेना ने बचाया है? जब वे होटलों में घुसे तो हजारों लोग उनके निशाने पर थे। वे चाहते तो सबको मार सकते थे। उनके पास इतना गोला-बारूद था कि ताज और ओबरॉय होटेलों का नाम-ओ-निशान तक नहीं बचता। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने इंतजार किया कि पूरी दुनिया का मीडिया उनके आगे घुटने टेक कर और जमीन पर लेटकर यह दिखाने को मजबूर हो जाए कि वे क्या कर सकते हैं। उनकी चलाई एक-एक गोली पर रिपोर्टर्स चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे थे – देखिए एक गोली और चली। इसे आप जीत कहेंगे?

यह देश पर सबसे बड़ा आतंकी हमला था...1993 के बम ब्लास्ट के बाद भी यही कहा गया था। जब वे हमारा जहाज कंधार उड़ा ले गए थे, तब भी यही कहा था। संसद पर हमला हुआ तब भी यह शब्द थे। अहमदाबाद को उड़ाया था, तब भी सब यही सोच रहे थे। दिल्ली, जयपुर, मुंबई लोकल...हर बार उनका हमला बड़ा होता गया...क्या लगता है अब इससे बड़ा हमला नहीं हो सकता? बड़े आराम से होगा और हम तब भी यही कह रहे होंगे।

क्या इसका इलाज अफजल की फांसी में है? क्या इसका इलाज पाकिस्तान पर हमले में है? क्या इसका इलाज पोटा में है? आतंकियों ने अपने ई-मेल में लिखा था कि वे महाराष्ट्र एटीएस के मुसलमानों पर जुल्म का बदला ले रहे हैं। वे गुजरात का बदला ले रहे हैं। वे आजमगढ़ का बदला ले रहे हैं। वे धर्म के नाम पर लड़ रहे हैं। भले ही उनकी गोलियों से मुसलमान भी मरे, लेकिन वे मुसलमानों के नाम पर लड़ रहे हैं। यूपी के किसी छोटे से शहर के कॉलेज में पढ़ने वाला अंसारी जब देखेगा कि आजमगढ़ से हुई किसी भी गिरफ्तारी को सही ठहरा देने वाले लोग कर्नल पुरोहित और दयानंद पांडे से चल रही पूछताछ पर ही सवाल उठा देते हैं, तो क्या वह धर्म के नाम पर हो रही इस लड़ाई से प्रभावित नहीं होगा? क्या गुजरात को गोधरा की 'प्रतिक्रिया' बताने वाले लोग मुंबई को गुजरात की प्रतिक्रिया मानने से इनकार कर पाएंगे?

जब वे लोग इस तरह के कत्ल-ए-आम पर उतर आए हैं तो क्या गलत है हिंदू प्रतिक्रिया भी। इसके जवाब में फिर मुस्लिम प्रतिक्रिया होगी। फिर हिंदू...फिर...

(नवभारतटाइम्स.कॉम से साभार)