सुना आपने...
आज शनिवार है...सुबह होते ही हजारों बच्चे सड़कों पर निकल पड़े...हाथ में लटकते बर्तन...बर्तन में तेल...और तेल में डूबे लोहे के पतरे...इस लोहे के पतरे को लोग शनिदेव कहते हैं...पूजते हैं...ट्रैफिक लाइट्स और जहां-तहां उग आए शनि मंदिरों के सामने इन बच्चों की भीड़...हर गाड़ी के पास जाएंगे...शीशा उतरेगा...एक, दो, कभी-कभी पांच रुपये का सिक्का...टन्न...कुछ लोग उस तेल में मुंह भी देखना चाहते हैं...
मुझे नहीं पता कैसे इन बच्चों के दिमाग में यह बात आई होगी...कैसे इन्हें पता चला होगा कि ये बड़ी-बड़ी गाड़ियों वाले...इस लोहे के पतरे से डरते हैं...यूं किसी के मांगने पर कुछ दें न दें...पर उस पतरे के नाम पर जरूर देते हैं...पिछले कुछ सालों में शनि मंदिरों की तादाद कितनी बढ़ गई है...और मंदिरों के सामने शनिवार को लगने वाली भीड़ भी...भीड़ के साथ ही बढ़े हैं ये बच्चे...कई बच्चे क्रिएटिव होते हैं...बर्तन को सजाकर लाते हैं...लाल कपड़ा...घोटे वाला...उस बर्तन में सिक्के ज्यादा डलते होंगे शायद...शनिवार को इन्हें फटे-पुराने कपड़े भी नहीं पहनने पड़ते...बेचारा भी नहीं दिखना पड़ता...जिन्हें भिखारियों से दिक्कत है...और जिन्हें भीख मांगते बच्चों पर तरस आता है...उन्हें भी इनसे समस्या नहीं है...एक-दो रुपये देकर बलाएं टलती हैं, तो हर्ज क्या है...इन बच्चों को लेकर हमारी चिंता कितनी है? बस गाड़ी का शीशा उतारते वक्त एक दूं या दो के गणित जितनी? भला हो शनिदेव का...इन बच्चों को संभाले है...भिखारी बनाए बिना...शुक्रिया शनिदेव...
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Saturday, 7 February 2009
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