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Thursday, 25 December 2008

आज एक साथी को मंदी ने लील लिया

सुना आपने

मंदी आ गई है...मैंने अब तक सुना ही था...देखा नहीं था...आसपास से मंदी के मारों की कराहें सुनाई दे रही थीं...लेकिन कुछ दिखाई नहीं दे रहा था...दर्द का नहीं पता था...आज पड़ा मंदी का चाबुक पीठ पर...कल दफ्तर पहुंचा...सब ठीक था...मस्त था...क्रिसमस की तैयारियां चल रही थीं...प्लास्टिक के फूलों से त्योहार की खुशियां महक रही थीं...काम जारी था...अचानक बॉस ने सबको अपने ऑफिस में बुला लिया...सब हैरत में थे...ऐसा होता नहीं है...खुसर-फुसर करते हम दफ्तर में चल पड़े...मॉर्निन्ग शिफ्ट के ही लोग थे...चार-पांच...सर गंभीर थे...मामला गंभीर था...अच्छी खबर नहीं...सर ने कहा...कुछ घबराहट हुई...सर आंखें नहीं मिला रहे थे...मैनेजमंट ने कहा है...दो लोगों को जाना होगा...बड़ी मुश्किल से ये दो नाम चुन पाया हूं...क्या करूं...इतना कहते-कहते सर फफक पड़े...सबसे मजबूत इंसान रो रहा था...सब चुपचाप दफ्तर से निकलकर अपनी-अपनी सीटों पर जा बैठे...कोई किसी से बात नहीं कर रहा था...कोई किसी से बात कर नहीं पा रहा था...कुछ देर में ‘वह’ आया...सबके साथ हंसा-मुस्कुराया...नया बच्चा है...खूब जोश है...दफ्तर आता है तो खुश होता है...मेरे पास आया...भैया कुछ नया सोचा है...आपकी शिफ्ट तो खत्म हो रही है...बाद में बताऊंगा...अपना लॉग इन दे दीजिए...काम करना है...अपनी सीट पर जा बैठा...काम में जुट गया...मेरे पेट में तितलियां कुड़मुड़ा रही थीं...कुछ देर में सर बाहर आए...उसे कहा जरा अंदर आओ...मेरी सांसें तेज हो गईं...आंखें भारी हो रही थीं...हाथ कांप रहे थे...अभी शिफ्ट खत्म होने में कुछ देर बाकी थी...वह अंदर चला गया था...कुछ देर में बाहर आएगा तो आंखों में आंखें डाल देगा...मैं डर गया...चुपके से उठा और निकल लिया...मेरे बस की बात नहीं थी...

कुछ देर बाद उसका फोन आया...भैया...इतना कहकर रोने लगा...फूट-फूटकर रो रहा था...मैं चाबुक का दर्द महसूस कर रहा था...

आज सुबह दफ्तर पहुंचा...दफ्तर सजा हुआ था...बेहतरीन सजावट थी...काफी खर्च किया गया था...बहुत खूबसूरत क्रिसमस ट्री था...लेकिन उसमें त्योहार की खुशियों की महक नहीं थी...मंदी की बू आ रही थी...