अपनी पिछली पोस्ट हिंदू बच्चे का मुस्लिम नाम...हाय राम में मैंने एक दुआ मांगी थी। आप सभी साथियों ने उस दुआ के लिए हाथ उठाए थे...लेकिन सोमा वैद्य उससे पूरी तरह सहमत नहीं हैं। उनका मानना थोड़ा अलग है। सहमति-असहमति से परे, उनकी टिप्पणी पढ़ने लायक है...
बिल्कुल सही कहा तुमने ….नाम का मतलब उस शब्द का मतलब कम और उस व्यक्ति के धर्म से ज्यादा लगाया जाता है ...जो गलत नहीं है....लेकिन मेरी समझ से यह भी सही नहीं कि किसी धर्म विशेष के व्यक्ति का नाम किसी और धर्म के अनुसार हो ...वजह है... इसके पीछे कारण कट्टर होना नहीं। नाम कहीं न कहीं उन भावनाओं, संस्कृतियों से जुड़ा हुआ है जिन्हें आप मानते हैं ....( शौकिया, फैशनेबल लोगों को छोड़ दें तो ) अगर किसी के नाम से यह पता चलता है कि वह किस संस्कृति में पला बढ़ा है.. किसमें उसकी आस्था है.. तो उसमें कोई हर्ज नहीं। तकलीफ इस बात से है कि हर धर्म को लेकर लोग पूर्वाग्रहों ( शायद यह शब्द ठीक है ) से ग्रसित हैं ..और बस उसके मुताबिक बन जाती है सोच .... इस्माइल नाम सुनते ही दिमाग में हजारों ख्याल दौड़ जाएंगे...तो स्टीवन के नाम से कुछ और ही तस्वीर उभर कर आएगी ...यह जानने की कोशिश किए बिना कि गलत तो सुरेश या दलजीत भी हो सकते हैं...हिंदू अगर अपने बेटे का नाम अयान रखे तो यकीनन काबिल-ए-तारीफ है...लेकिन शायद इससे ज्यादा जरूरत अपनी सोच को बढ़ाने और अपने धर्म को मानते हुए भी औरों के धर्म को आदर देने की है ।
(सोमा वैद्य स्टार न्यूज, मुंबई में असोसिएट प्रड्यूसर हैं।)
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Tuesday, 30 June 2009
Thursday, 25 June 2009
हिंदू बच्चे का मुस्लिम नाम...हाय राम !
मुझे नहीं पता था कि यह ‘अपराध’ है। मैंने तो बस एक नाम सुझाया था...वे एक मीनिंगफुल नाम चाहते थे...आजकल यही फैशन है ना...नाम का अच्छा सा मीनिंग होना चाहिए...नाम बोलते हुए चाहे जबान टेढ़ी हो जाए...और मीनिंग भी ऐसा निकलेगा कि उसका भी मीनिंग पूछना पड़े...लेकिन उन्होंने जैसे ही कहा हमारे लिए तो यह ईश्वर का तोहफा है...मेरे मुंह से एक ही शब्द निकला...अयान...अयान यानी खुदा का तोहफा...गिफ्ट ऑफ गॉड...
बस यही मुझसे गलती हो गई...नाम बताते वक्त मैंने यह नहीं सोचा कि अयान उर्दू का लफ़्ज़ है और उस बच्चे के मां-बाप उर्दू को मुसलमानों की जबान समझते हैं। सुनते ही उन्होंने कहा...यह तो मुस्लिम नाम है...मुस्लिम नाम? क्या उर्दू का हर लफ़्ज़ मुस्लिम है?
फिल्म 'अ वेन्जडे' में एक बहुत अच्छा डायलॉग है – नाम रहने दीजिए, क्योंकि नाम को लोग धर्म के साथ जोड़ लेते हैं...अगर हिंदू और मुस्लिम नाम का फर्क मिट जाए तो कैसा हो...कोई अपना नाम बताए और पता ही न चले कि वह हिंदू है या मुसलमान...प्रभात अपने बेटे का नाम नज़ीर रखे और उस्मान के बेटी का नाम हो अपूर्वा...मैं तो यह भी चाहता हूं जॉन अपनी बेटी को ‘बाइ गुरमीत...’ कहकर स्कूल भेजें और कुलविंदर सिंह जी अपने बेटे को पंजाबी में प्यार से ‘ओ पीटरया...’ कह कर पुकारें...लेकिन कुछ लोग संस्कृति की दुहाई देते हैं...उनका तर्क है कि नाम अपनी संस्कृति और सभ्यता से प्रेरित होने चाहिए और उसकी पहचान होने चाहिए...
फिर भी गंगा-जमुनी तहजीब तो हम सबकी साझी है...आज जो संस्कृति हम सबकी है, उसमें कितनी ही चीजें, परंपराएं और चिह्न साझे हो चुके हैं...दुनियाभर की शादियों में लोग पंजाबी पॉप सॉन्ग्स पर ही नाचते हैं...फिर कब तक उन सैकड़ों साल पुरानी बातों की दुहाई देते रहेंगे हम...
जींस कल्चर की सबसे अच्छी बात यही है कि नौजवान अब धार्मिक चिह्न नहीं पहनते...किसी को राम और ओम लिखे कुर्ते पहने देख आप उसका धर्म नहीं बता सकते...धर्मों की ऐसी बहुत सारी खाइयों को पाटने के लिए बहुत सी बातों को बदलना है...क्यों ना शुरुआत नाम से ही करें...
(उस बच्चे का नाम अयान ही रखा गया है...उम्मीद है जब वह बड़ा होगा, तब तक भेद मिट चुका होगा...लोग उसे इंसान के तौर पर ही पहचानेंगे हिंदू या मुसलमान के तौर पर नहीं...आमीन !)
बस यही मुझसे गलती हो गई...नाम बताते वक्त मैंने यह नहीं सोचा कि अयान उर्दू का लफ़्ज़ है और उस बच्चे के मां-बाप उर्दू को मुसलमानों की जबान समझते हैं। सुनते ही उन्होंने कहा...यह तो मुस्लिम नाम है...मुस्लिम नाम? क्या उर्दू का हर लफ़्ज़ मुस्लिम है?
फिल्म 'अ वेन्जडे' में एक बहुत अच्छा डायलॉग है – नाम रहने दीजिए, क्योंकि नाम को लोग धर्म के साथ जोड़ लेते हैं...अगर हिंदू और मुस्लिम नाम का फर्क मिट जाए तो कैसा हो...कोई अपना नाम बताए और पता ही न चले कि वह हिंदू है या मुसलमान...प्रभात अपने बेटे का नाम नज़ीर रखे और उस्मान के बेटी का नाम हो अपूर्वा...मैं तो यह भी चाहता हूं जॉन अपनी बेटी को ‘बाइ गुरमीत...’ कहकर स्कूल भेजें और कुलविंदर सिंह जी अपने बेटे को पंजाबी में प्यार से ‘ओ पीटरया...’ कह कर पुकारें...लेकिन कुछ लोग संस्कृति की दुहाई देते हैं...उनका तर्क है कि नाम अपनी संस्कृति और सभ्यता से प्रेरित होने चाहिए और उसकी पहचान होने चाहिए...
फिर भी गंगा-जमुनी तहजीब तो हम सबकी साझी है...आज जो संस्कृति हम सबकी है, उसमें कितनी ही चीजें, परंपराएं और चिह्न साझे हो चुके हैं...दुनियाभर की शादियों में लोग पंजाबी पॉप सॉन्ग्स पर ही नाचते हैं...फिर कब तक उन सैकड़ों साल पुरानी बातों की दुहाई देते रहेंगे हम...
जींस कल्चर की सबसे अच्छी बात यही है कि नौजवान अब धार्मिक चिह्न नहीं पहनते...किसी को राम और ओम लिखे कुर्ते पहने देख आप उसका धर्म नहीं बता सकते...धर्मों की ऐसी बहुत सारी खाइयों को पाटने के लिए बहुत सी बातों को बदलना है...क्यों ना शुरुआत नाम से ही करें...
(उस बच्चे का नाम अयान ही रखा गया है...उम्मीद है जब वह बड़ा होगा, तब तक भेद मिट चुका होगा...लोग उसे इंसान के तौर पर ही पहचानेंगे हिंदू या मुसलमान के तौर पर नहीं...आमीन !)
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