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Friday, 21 August 2009

बीजेपी लोकशाही पर चले या भौंकशाही पर, बुक पर बैन नहीं चलेगा

बीजेपी जसवंत सिंह को निकाले या गले में डाले, मेरी बला से। उनकी पार्टी में लोकशाही है या भौंकशाही, यह भी वे आपस में ही समझें। पार्टी आरएसएस की तान पर नाचती है या आरएसएस पार्टी को जांचती है, मुझे कोई मतलब नहीं। मैं किताब पर बैन सहन नहीं कर सकता।

बीजेपी के भीतर किताब पर जो भी हल्ला मचे, आप आम आदमी को किताब पढ़ने से कैसे रोक सकते हैं? पार्टी को किताब पसंद नहीं आई या उसका लिखनेवाला, यह उनकी अपनी समस्या है। वे तय करने वाले कौन होते हैं कि मैं क्या पढ़ूंगा और क्या नहीं?

जसवंत सिंह ने जो लिखा है, उस पर बीजेपी को आपत्ति है, एक राज्य की जनता को नहीं। और अगर आपत्ति है भी, तो जनता खुद तय करेगी कि किताब पढ़नी है या कूड़े में फेंकनी है। कोई मुख्यमंत्री सिर्फ इसलिए ऐसा नहीं कर सकता, क्योंकि किताब में जो लिखा गया है, वह उसकी पार्टी की विचारधारा के खिलाफ है।

जसवंत सिंह को निकालना तानाशाही हो या न हो, किताब पर बैन लगाना तानाशाही है। राज्य की जनता आपकी पार्टी की मेंबर नहीं है, जिसके लिए आप विप जारी करेंगे कि क्या लिखे और क्या पढ़े।

नरेंद्र मोदी के इस कदम का सख्त विरोध होना चाहिए। मैं इसका विरोध करता हूं।