Showing posts with label अस्पताल. Show all posts
Showing posts with label अस्पताल. Show all posts

Thursday, 22 January 2009

अस्पतालः उदासियों की भीड़ और उम्मीदों का मजमा

सुना आपने

अस्पताल में था...तीन दिन और दो रात का स्टे...फ्री नहीं था...सीजनल डिस्काउंट भी नहीं था...मेडिक्लेम वालों के पास भी सौ बहाने हैं पैसे न देने के...22-23 इजेक्शंस, 12-15 टेबलेट्स, दो उनींदी रातें और कई हजार देकर किसी तरह पीछा छूटा...डॉक्टर तो आने ही नहीं दे रहा था...बचपन में मामा के घर बिताए दिन याद आ गए...वे भी आने नहीं देते थे...इसी तरह इसरार करते थे...दो दिन और रह जाओ...अभी तो छुट्टियां बाकी हैं...प्लीज, अब जाने दीजिए...होम वर्क भी तो करना है...

घर आया...दर्द ज्यों को त्यों था...बिस्तर पर लेटते हुए आह निकली तो अस्पताल याद आ गया...अजीब जगह है...उदासियों की भीड़ और उम्मीदों का मजमा...मंदिर की तरह...मस्जिद की तरह...गुरुद्वारे और और चर्च को भी गिन लीजिए...नहीं तो कहेंगे तकलीफ में सांप्रदायिक हो गया हूं...इन जगहों से अस्पताल थोड़ा बेहतर है...डॉक्टर साहब भगवान हो जाते हैं...भगवान डॉक्टर नहीं हो पाता...डॉक्टर न करे तो गला पक़ड़ सकते हैं...भगवान न करे तो...न करे...डॉक्टर जितने मांगेगा, देने पड़ेंगे...भगवान मांगता नहीं फिर भी खूब मिल जाते हैं...आदमी और पत्थर में कुछ तो फर्क हो..

अस्पताल में उम्मीदें ज्यादा होती हैं...या उम्मीद करने का अधिकार ज्यादा होता है...हां, गारंटी कहीं नहीं है...देर और अंधेर की तसल्ली दोनों जगह है...डॉक्टर अंधेरे में रखे रहते हैं और देर किए जाते हैं...भगवान का मुझे कोई एक्सपीरिएंस नहीं है...उस बच्चे को भी नहीं होगा...प्रभजोत...दो साल का है...बहुत प्यारा है...दोनों फिजियोथेरेपी के लिए जाते तो मुलाकात हो जाती...छत से गिरा था...डर की वजह से झुक गया...वहां सब कहते हैं...इस मासूम के साथ इतना अन्याय...सब भगवान की माया है...सबको भगवान का एक्सपीरिएंस है...अब डॉक्टर की माया देखनी है...मां रोज उसे लाती है...उदास है...दिखाती नहीं है...बस उम्मीदें चमकती रहती हैं आंखों में...बच्चे को तो दोनों का ही नहीं पता...लेकिन उसे ‘डॉतर अंकल’ पसंद हैं...

लेकिन उस महिला को पता है...वही जो सामने वाली दीवार के साथ लगी खूंटी पर गर्दन लटकाए बैठी रहती है...मजाक नहीं सच...गर्दन दुखने लगी है...सिलाई का काम करती है...घर पर ही...पतली सी है...गरीब दिखती है...बताइए, देखने से ही गरीब और अमीर का पता चल जाता है...सब ब्रैंड्स की माया है...बोलने की आदत काफी है, इसलिए नर्सों को सब बता दिया...मुझे भी सुनने की आदत है...सब सुन लिया...10-15 साल हो गए...लगातार सिलाई कर रही है...झुकी रहती होगी...गर्दन भी झुक गई है...अब दुखती है...फिजियोथेरेपिस्ट उसकी गर्दन को कॉलर में लपेटते हैं और खूंटी से लटका देते हैं...मकैनिकल खूंटी है...ऊपर की ओर खींचती है...वह भी ऊपर खिंच जाती है...सब हंस पड़ते हैं...वह झेंप जाती है...मेरा वजन कम है ना...उम्मीदें हंस देती है...मुझे जल्दी ठीक कर दीजिए...काम का बहुत हर्जा होता है...अभी तुम्हें काम नहीं करना है...काम नहीं करूंगी तो कैसे चलेगा...अब उदासी हंस देती है...